HINDUISM AND SANATAN DHARMA

Hinduism,Cosmos ,Sanatan Dharma.Ancient Hinduism science.

Dholavira,Gujarat-Archaeological Site : World Heritage Site

धौलावीरापुरातात्त्विकस्थल : #विश्वविरासतस्थल

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27 जुलाई, 2021 को गुजरात में स्थित #धौलावीरा को यूनेस्को द्वारा भारत का 40वाँ विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया।भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) ने धोलावीरा की खोज 1967-68 में की। इसे हड़प्पाकाल के पांच सबसे बड़े स्थलों में शुमार किया जाता है। सिंधु-घाटी सभ्यता से जुड़ा स्थल पुरातत्विक लिहाज से काफी अहमियत रखता है। इस नगर की लम्बाई पूरब से पश्चिम की ओर है। नगर के चारों तरफ एक मज़बूत दीवार के निर्माण के साक्ष्य मिले हैं! इस नगर की योजना समानांतर चतुर्भुज के रूप में की गयी थी। इस नगर की लम्बाई पूरब से पश्चिम की ओर है। नगर के चारों तरफ एक मज़बूत दीवार के निर्माण के साक्ष्य मिले हैं। प्राचीन इतिहास और पुरातत्तव में रुचि रखने वालों के लिये तो यह एक जाना पहचाना नाम है लेकिन जिनका संबंध इतिहास से बहुत गहराई से न हो, उनके लिये ‘धौलावीरा’ वर्तमान में सुर्खियाँ बटोरने वाली कोई सूचना भर हो सकती है। हालाँकि सामान्य रूप से यह नाम सुनने के पश्चात यदि हम अपनी स्मृतियों पर ज़ोर डालें तो हमें याद आता है कि धौलावीरा के बारे में हमने बचपन में इतिहास की किताबों में पढ़ा था। स्मृति पर थोड़ा और ज़ोर डालने पर हमें याद आता है कि धौलावीरा विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यताओं में से एक हड़प्पा सभ्यता अर्थात सिन्धु घाटी सभ्यता का एक पुरास्थल है। लेकिन धौलावीरा का महत्त्व इन बुनियादी तथ्यों से कहीं अधिक व्यापक है। धौलावीरा के महत्त्व का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह भारत में #हड़प्पा_सभ्यता का पहला ऐसा पुरास्थल है जिसे यह दर्ज़ा दिया गया है। इसके पूर्व सिन्धु घाटी सभ्यता के एक ही पुरास्थल ‘मोहनजोदड़ो’ को ही विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया था किन्तु वर्तमान में यह पाकिस्तान के सिंध प्रांत में है। यही नहीं सिन्धु घाटी सभ्यता का सबसे चर्चित और सबसे पहले खोजे गए पुरास्थल ‘हड़प्पा’ को भी विश्व विरासत स्थल का तमगा मिलना अभी बाकी है।

धौलावीरा #कच्छ के महान रण में रेत के समुंदर के बीचो-बीच खादिर बेट द्वीप पर #मनसर और मनहर नामक दो जलधाराओं के बीच स्थित है। ऐसा आकलन है कि आज से 5000 वर्ष पूर्व रण का जलस्तर इतना ऊँचा था कि समुद्री नाव तट से चलते हुए सीधा इस स्थल तक पहुँच जाते थे। कर्क रेखा के निकट स्थित होने के कारण इसका भूगोल और भी रोचक हो जाता है। यहाँ से कुछ मील आगे जाने पर हम भारत-पाकिस्तान सीमा पर भी पहुँच जाते हैं।

धौलावीरा भारत में #राखीगढ़ी के पश्चात् #सिंधु_सभ्यता का सबसे बड़ा पुरास्थल है। सम्पूर्ण विश्व को इसके बारे में पता तो 60 के दशक में ही चल गया था जब पुरातत्वविद् जगपति जोशी द्वारा इसकी खोज की गई किंतु इस स्थल की व्यापक खुदाई 1990 में आर.एस. बिस्ट द्वारा करवाई गई जिसके पश्चात् ही हमें ज्ञात हुआ कि आज से लगभग 5 हजार वर्ष पूर्व यह भारत के सबसे व्यस्ततम महानगरों में से एक था। यह एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। यही कारण है कि एक इतिहासकार ने इसे ‘महाजनों का शहर’ कहा है। अन्य हड़प्पाई नगरों के विपरीत यह नगर तीन भागों में विभाजित था- दुर्ग (गढ़ी), मध्य नगर तथा निचला नगर। इसके अतिरिक्त इसके चहारदीवारी के चारों ओर भी कुछ बस्तियों के अवशेष मिले हैं, जिसे उपनगर कहा गया है। धौलावीरा में बेहतर नगर नियोजन तथा बेहतर जल निकासी तथा सीवेज व्यवस्था जैसी विशेषताएँ तो हैं ही किंतु जो चीज़ इसे अन्य पुरास्थलों की तुलना में विशेष स्थान दिलवाती है वह है इसकी बेहतर जल संचयन अथवा जल प्रबंधन की व्यवस्था। यह क्षेत्र अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र में आता था जहाँ वर्षा की मात्रा औसत से कम होती थी किंतु फिर भी इनकी वाटर हार्वेस्टिंग तकनीक के कारण इतने बड़े नगर के लिये पानी की कमी नहीं पड़ती थी। यहाँ पर पत्थरों की सहायता से वर्षा के पानी के संचयन के लिये जलाशयों (Reservoires) की एक श्रृंखला बनाई गई थी।

धौलावीरा से दस अक्षरों वाला एक सूचना पट्ट भी मिला है जो सिंधु घाटी सभ्यता में प्राप्त सभी अभिलेखों में सबसे बड़ा है। पुरातत्वविद् तथा धौलावीरा के उत्खननकर्ता आर.एस. बिष्ट ने इसे ‘दुनिया के सर्वाधिक पुराने अर्थात् पहले साइन बोर्ड’ की संज्ञा दी है। इस साइन बोर्ड पर क्या लिखा है इसका पता तो अभी नहीं चल पाया है क्योंकि इस पर अंकित भावचित्रात्मक लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।

धौलावीरा की सांस्कृतिक यात्रा अनेक अवस्थाओं से गुजरती हुई एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ी थी। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि धौलावीरा सभ्यता की यात्रा क़रीब 1000 वर्षो की थी।

▪️सभ्यता की प्रथम अवस्था

धौलावीरा सभ्यता की प्रथम अवस्था से यह आभास मिलता है कि यहाँ पर बसने वाले लोग अपने साथ एक पूर्ण विकसित सभ्यता लेकर आये थे। पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि यहाँ पर बसने वाले लोग सम्भवतः सिंध और बलूचिस्तान से आये थे। सभ्यता के प्रथम चरण के निवासी मिट्टी के बर्तन बनाने, तांबे शोधने, पत्थर तराशने, उपरत्नों, सेलखड़ी, शंख आदि के मनके बनाये। इस सभ्यता के लोगों ने निश्चित माप के सांचों में ढली मिट्टी की ईटों का प्रयोग किया। ईटों के साथ-साथ सीमित मात्रा में पत्थरों के उपयोग के भी साक्ष्य मिले हैं। आयताकार आकार में निर्मित यहाँ की बस्ती के चारों ओर 11 मीटर मोटी ईटों की प्राचीर निर्मित थी।

सभ्यता का दूसरा चरण

सभ्यता के दूसरे चरण में ‘दुर्ग प्राचीर’ की अन्दर की ओर 3 मीटर चौड़ाई बढ़ा दी गयी। प्राचीर का निर्माण कच्ची ईटों से हुआ था। दीवार के अन्दर वाले भाग में सफ़ेद, गुलाबी, गहरा गुलाबी रंग की मिट्टी की लगभग 13 परतों का लेप चढ़ाया गया है। ऐसी ही मिट्टी का प्रयोग भवन के अन्दर और बाहर की दीवारों पर पलस्तर के लिए किया गया हैं

▪️सभ्यता का तीसरा चरण

सभ्यता का तीसरा चरण भी ‘दुर्ग की प्राचीर’ को मज़बूती प्रदान करने के लिए अन्दर की ओर दीवार को क़रीब साढ़े चार मीटर चौड़ी करने के साथ ही प्रारम्भ हुआ। इस चरण में विकसित हड़प्पीय नगर सभ्यता का विकासशील स्वरूप सामने आया। सभ्यता के इस चरण में उत्तर की ओर सभ्यता के द्वितीय चरण में निर्मित बस्तियों को उजाड़ कर एक मैदान का निर्माण किया गया। मैदान के उत्तर की तरफ जनसामान्य के लिए योजना अनुसार शहर का निर्माण किया गया। नगर के चारों ओर ‘रक्षा प्राचीर’ एवं ‘प्रासाद’ की चारों दीवारों के मध्य भाग में चार प्रवेश द्वारों का निर्माण किया गया। नवीन निर्मित नगर के दोनो भागों के मध्य भागों के मध्य खुले मैदान को ‘रंगमहल‘ की संज्ञा दी गयी। सम्भवतः मैदान का प्रयोग सार्वजनिक एवं सामूहित उत्सवों में किया जाता था।

▪️हड़प्पा संस्कृति का विकास

सभ्यता का तीसरा चरण लगभग 300 वर्षो तक जीवित रहा। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस सभ्यता की अंतिम अर्धशती में सम्भवतः यह नगर किसी भयंकर भूकम्प जैसे विनाशकारी प्रकोप की चपेट में आ गया था, जिसके कारण नगर के कई जगह ध्वस्त हो गये, पर आर्थिक रूप से सम्पन्न होने के कारण इस सभ्यता के लोगों ने अतिशीघ्र नगर का पु्नर्निर्माण कर लिया। तीसरे भाग के प्रकाश में आने के उपरान्त पुराने शहर को ‘मध्यमनगर’ एवं नये जुड़े भाग को ‘अवम’ नाम दिया। सभ्यता के तीसरे चरण में ‘चित्रालंकरण वाले मृदभांड’ प्रयोग किये गये जो शुद्ध रूप से हड़प्पा सभ्यता से सम्बन्धित थे। हड़प्पा सभ्यता से सम्बन्धित मुद्रायें एवं घनाकार ‘तौलने के बाट’ भी पहली बार यहाँ पर प्रकाश में आये। बर्तन के एक टुकड़े पर हड़प्पा लिपि के भी संकेत मिलते हैं। धौलावीरा की संस्कृति के इस चरण में निःसंदेह हड़प्पा संस्कृति का विकासोन्मुख रूप पहली बार स्पष्ट रूप से इस उपमहाद्वीप में प्रकाश में आया।

▪️सभ्यता का चौथा चरण

धौलावीरा में पानी भंडारण के तालाब की खुदाई, गुजरात

धौलवीरा की बहुआयामी समृद्ध सभ्यता अपने पूरे वैभव में सभ्यता के चौथे चरण में प्रचुर मात्रा मिली हैं, जैसे कलात्मक मृदभांड, विशिष्ट कलात्मक मुद्रायें, तौल के बाट, लिपिगत लेख, शंख, फियांस, तांबे व मिट्टी की चूड़ियां, उपरत्नों, सेलखड़ी, तांबे, सोने और पक्की मिट्टी के मनके, शंख के बने विविध आभूषण, सोने के छल्ले, मिट्टी की गाड़ियां, बैल व अन्य खिलौने, कुछ विशिष्ट शैली में निर्मित मृण्मयी मानवाकृतियां आदि, पर सभ्यता के इस चरण में प्राप्त बहुतायत कलाकृतियां हड़प्पा एवं मोहनजोदाड़ो से भिन्न हैं।

चूना पत्थर से निर्मित स्थापत्य नमूनों के कुछ अवशेषों जिनमें पीली व बैंगनी रंग की धारियां निर्मित हैं धौलावीरा की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से हैं।

▪️सभ्यता की पांचवी अवस्था

सभ्यता की पांचवी अवस्था में धौलावीरा की पूर्ण रूप से विकसित ‘हड़प्पा की सभ्यता’ में पतन के लक्षण दिखाई देने लगे। सर्वप्रथम नगर आयोजन एवं स्थापत्य के क्षेत्र में गिरावट के लक्षण दिखे। सम्भवतः इस गिरावट का महत्त्वपूर्ण कारण ‘प्रशासनिक अव्यवस्था’ था।

▪️सभ्यता का पतन

इस सभ्यता के पतन का सर्वाधिक बुरा प्रभाव तत्कालीन महाप्रसादों पर पड़ा जो सम्भ्वतः शक्ति के एक बड़े केन्द्र के रूप में इस्तेमाल किये जाते थे। ऐसा भी अनुमान लगाया जाता है कि शायद सभ्यता के पांचवे चरण में सम्पन्न वणिक व शिल्पी समूह के परिवार बेहतर अवसर की तलाश में नगर छोड़ बाहर जाने लगे। सम्भवतः ‘धौलावीरा की संस्कृति के पतन’ का समय 2,200 ई.पू. से 2000 ई.पू. तक रहा होगा।

कुछ समय पश्चात् धौलावीरा के टीलों पर उत्तर हड़प्पाकालीन लोगों ने अपनी बस्ती बसाई। यहाँ से मिली मुहरों के स्वरूप में अपने पूर्ववर्ती नगरों से प्राप्त मुहरों की अपेक्षा कुछ परिवर्तन दिखायी देता है। ये मुहरें आकार में छोटी एवं चित्रांकन हीन मिली हैं, पर इन पर सुन्दर ‘लिपि चिह्न’ खुदे मिले हैं। यहाँ से प्राप्त बाटों में अधिकांशत: संख्या ऐसे बाटों की है जिन्हें ठीक से घिस कर बनाया गया। ‘कुंभ कला’ के अन्तर्गत प्राप्त पतले, सुदर चमकीले बर्तन मिले है जो दक्षिणी राजस्थान की ‘अहाड’ या ‘बनास संस्कृति’ से सम्बन्धित हैं। यहाँ प्राप्त कुछ बर्तन ‘झूकड़शैली’ के भी हैं। धौलावीरा के अतिरिक्त इसके समकालीन सूरकोटदा एवं ‘देशलपुर’ से भी हड़प्पाकालीन लेख युक्त मुहरें प्राप्त हुई हैं, अन्यत्र किसी पुरास्थल से इस तरह की मुहरें नहीं मिली हैं।

▪️सभ्यता का छठा चरण

सभ्यता के छठे चरण में भी कुछ परिवर्तन के साक्ष्य मिले हैं। जैसे इस समय निर्माण कार्य में प्रयुक्त की जाने वाली ईटों का कोई नाप नहीं होता था। इस समय के बने मकान सीधे प्रकार से सटाकर बनाये जाते थे। मकानों के बीच गलियां भी पूर्णतः नये आयोजन के अनुसार बनाई गयी, इस समय के निर्मित मकानों में हड़प्पाकालीन मकानों से निकाले गये पत्थरों का उपयोग किया गया। सम्भवतः इस समय बने मकानों की ऊंचाई कम एवं छतें लकड़ी, टहनी एवं घास-फूस से बनाई जाती थी। शंख एवं उपरत्नों के आभूषण शायद इस समय व्यापक स्तर पर निर्मित किये जाते थे। अनुमानतः ‘धौलावीरा की हड़प्पा संस्कृति’ का छठा चरण सौ वर्ष तक जीवित रहा।

▪️सभ्यता का सातवां एवं अन्तिम चरण

सभ्यता के सातवें एवं अन्तिम चरण में लोग आयताकार मकानों में रहने की अपेक्षा वृत्ताकार मकानों को पसंद करने लगे। ‘बुंगा’ या ‘कुंभा’ कहे जाने वाले ये मकान लकड़ी एवं घास-फूस के बनाये गये थे। दीवार को पत्थर से बनाया गया था। शायद दो से ढाई फीट पत्थर के ऊपर लकड़ी का गोलाकार ढांचा खड़ा कर इसके ऊपर ‘कुल्लेदार गोल छत’ बनाई जाती थी। इस तरह क़रीब 1,000 वर्ष तक जीवित रहने वाली यह सभ्यता उजड़ने के बाद पुनः नहीं बस सकी।

धौलावीरा के प्रथम एवं द्वितीय चरण का ‘आम्री’ के द्वितीय काल के द्वितीय उपकाल, ‘नौशेरों’ के प्रथम काल के उत्त्तरार्द्ध से समीकरण स्थापित किया जा सकता है। धौलावीरा के तीसरे चरण का समीकरण ‘आम्री’ के तृतीय काल के प्रथम उपकाल, ‘नौशेरों’ के द्वितीय काल एवं मोहनजोदाड़ो के उन स्तरों से, जिनका उत्खनन 1958 में ह्वीलर के नेतृत्व में किया गया, से किया जाता है।

अपने सातवे चरण में धौलावीरा नगर सभ्यता से ग्रामीण सभ्यता में परिवर्तित हो गयी। धौलावीरा नगर का पूर्व से पश्चिम का विस्तार 771 मीटर एवं उत्तर से दक्षिण का विस्तार लगभग 616.80 मीटर है, प्रासाद के अन्दर पूर्व से पश्चिम में विस्तार औसतन 114 मीटर एवं उत्तर से दक्षिण से लगभग 92.50 मीटर है। धौलावीरा भारत में स्थित सबसे बड़ा ‘हडप्पा स्थल’ है। सम्पूर्ण सिन्धु सभ्यता के स्थलों में क्षेत्रफल की दृष्टि से ‘धौलावीरा’ का स्थान ‘पांचवां’ है।

▪️धौलावीरा के विषय में प्रमुख तथ्य:-*

यह दक्षिण एशिया में सबसे अनूठी और अच्छी तरह से संरक्षित शहरी बस्तियों में से एक है।
इसकी खोज वर्ष 1968 में पुरातत्त्वविद् जगतपति जोशी द्वारा की गई थी।
पाकिस्तान के मोहनजोदड़ो, गनेरीवाला और हड़प्पा तथा भारत के हरियाणा में राखीगढ़ी के बाद धौलावीरा सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) का पांँचवा सबसे बड़ा महानगर है।
Indus Valley Civilization जो कि आज पाकिस्तान और पश्चिमी भारत में पाई जाती है, लगभग 2,500 ईसा पूर्व दक्षिण एशिया के पश्चिमी भाग में फली-फूली। यह मूल रूप से एक शहरी सभ्यता थी तथा लोग सुनियोजित और अच्छी तरह से निर्मित कस्बों में रहते थे, जो व्यापार के केंद्र भी थे।
साइट में एक प्राचीन आईवीसी/हड़प्पा शहर के खंडहर हैं। इसके दो भाग हैं: एक चारदीवारी युक्त शहर और शहर के पश्चिम में एक कब्रिस्तान।
चारदीवारी वाले शहर में एक मज़बूत प्राचीर से युक्त एक दृढ़ीकृत गढ़/दुर्ग और अनुष्ठानिक स्थल तथा दृढ़ीकृत दुर्ग के नीचे एक शहर स्थित था।
गढ़ के पूर्व और दक्षिण में जलाशयों की एक शृंखला पाई जाती है।

▪️अवस्थिति:-

धोलावीरा का प्राचीन शहर गुजरात राज्य के कच्छ ज़िले में एक पुरातात्त्विक स्थल है, जो ईसा पूर्व तीसरी से दूसरी सहस्राब्दी तक का है।
धौलावीरा कर्क रेखा पर स्थित है।
यह कच्छ के महान रण में कच्छ रेगिस्तान वन्यजीव अभयारण्य में खादिर बेट द्वीप पर स्थित है।
अन्य हड़प्पा पूर्वगामी शहरों के विपरीत, जो आमतौर पर नदियों और जल के बारहमासी स्रोतों के पास स्थित हैं, धौलावीरा खादिर बेट द्वीप पर स्थित है।
यह साइट विभिन्न खनिज और कच्चे माल के स्रोतों (तांबा, खोल, एगेट-कारेलियन, स्टीटाइट, सीसा, बैंडेड चूना पत्थर तथा अन्य) के दोहन हेतु महत्त्वपूर्ण थी।
इसने मगन (आधुनिक ओमान प्रायद्वीप) और मेसोपोटामिया क्षेत्रों में आंतरिक एवं बाहरी व्यापार को भी सुगम बनाया।

▪️पुरातात्त्विक अवशेष:-

यहाँ पाए गए कलाकृतियों में टेराकोटा मिट्टी के बर्तन, मोती, सोने और तांबे के गहने, मुहरें, मछलीकृत हुक, जानवरों की मूर्तियाँ, उपकरण, कलश एवं कुछ महत्त्वपूर्ण बर्तन शामिल हैं।
तांबे के स्मेल्टर या भट्टी के अवशेषों से संकेत मिलता है कि धौलावीरा में रहने वाले हड़प्पावासी धातु विज्ञान जानते थे।
ऐसा माना जाता है कि धौलावीरा के व्यापारी वर्तमान राजस्थान, ओमान तथा संयुक्त अरब अमीरात से तांबा अयस्क प्राप्त करते थे और निर्मित उत्पादों का निर्यात करते थे।
यह अगेट (Agate) की तरह कौड़ी (Shells) एवं अर्द्ध-कीमती पत्थरों से बने आभूषणों के निर्माण का भी केंद्र था तथा इमारती लकड़ी का निर्यात भी करता था।
सिंधु घाटी लिपि में निर्मित 10 बड़े पत्थरों के शिलालेख है, शायद यह दुनिया का सबसे पुराने साइन बोर्ड है।
प्राचीन शहर के पास एक जीवाश्म पार्क है जहाँ लकड़ी के जीवाश्म संरक्षित हैं।
अन्य IVC स्थलों पर कब्रों के विपरीत धौलावीरा में मनुष्यों के किसी भी नश्वर अवशेष की खोज नहीं की गई है।

▪️धौलावीरा स्थल की विशिष्ट विशेषताएँ:-

जलाशयों की व्यापक शृंखला।
बाहरी किलेबंदी।
दो बहुउद्देश्यीय मैदान, जिनमें से एक उत्सव के लिये और दूसरा बाज़ार के रूप में उपयोग किया जाता था।
अद्वितीय डिज़ाइन वाले नौ द्वार।
अंत्येष्टि वास्तुकला में ट्यूमुलस की विशेषता है – बौद्ध स्तूप जैसी अर्द्धगोलाकार संरचनाएँ।
बहुस्तरीय रक्षात्मक तंत्र, निर्माण और विशेष रूप से दफनाए जाने वाली संरचनाओं में पत्थर का व्यापक उपयोग।

▪️धौलावीरा का पतन:-

इसका पतन मेसोपोटामिया के पतन के साथ ही हुआ, जो अर्थव्यवस्थाओं के एकीकरण का संकेत देता है।
हड़प्पाई, जो समुद्री लोग थे, ने मेसोपोटामिया के पतन के बाद एक बड़ा बाज़ार खो दिया जो इनके स्थानीय खनन, विनिर्माण, विपणन और निर्यात व्यवसायों को प्रभावित करते थे ।
जलवायु परिवर्तन और सरस्वती जैसी नदियों के सूखने के कारण धौलावीरा को गंभीर शुष्कता का परिणाम देखना पड़ा।
सूखे जैसी स्थिति के कारण लोग गंगा घाटी की ओर या दक्षिण गुजरात की ओर तथा महाराष्ट्र से आगे की ओर पलायन करने लगे।
इसके अलावा कच्छ का महान रण, जो खादिर द्वीप के चारों ओर स्थित है और जिस पर धोलावीरा स्थित है, यहाँ पहले नौगम्य हुआ करता था, लेकिन समुद्र का जल धीरे-धीरे पीछे हट गया और रण क्षेत्र एक कीचड़ क्षेत्र बन गया !

धौलावीरा जैसे पुरास्थल हमारी पुरातन सभ्यता को जानने के साधन हैं। हम अपनी सभ्यता संस्कृति के बारे में जितना जानते हैं उससे भी कहीं अधिक जानकारी अभी बाहर आना बाकी है। यूनेस्कों द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा मिलने से इन पुरास्थलों को अंतर्राष्ट्रीय पहचान भी मिलेगी तथा अपने प्राचीन गौरव को जानने की आम-जन की अभिलाषा भी तीव्र होगी।


लेखन – अजेय प्रकाश शर्मा

Dholavira_Archaeological_Site : #World_Heritage_Site

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Dholavira, located in Gujarat, was declared as the 40th World Heritage Site of India by UNESCO on July 27, 2021. The Archaeological Department of India (ASI) discovered Dholavira in 1967-68. It is counted among the five largest sites of the Harappan period. The site associated with the Indus-Valley civilization is of great importance from the archaeological point of view. The length of this city is from east to west. Evidence has been found of the construction of a fortified wall around the city! The city was planned in the form of a parallelogram. The length of this city is from east to west. Evidence of the construction of a strong wall has been found around the city. For those interested in ancient history and archeology, it is a well-known name, but for those who are not deeply related to history, ‘Dholavira’ can be just some information grabbing headlines at present. However, after hearing this name in general, if we put emphasis on our memories, then we remember that we had read about Dholavira in the history books in childhood. Putting a little more emphasis on memory, we remember that Dholavira is one of the oldest civilizations in the world, an ancient site of the Harappan civilization, that is, the Indus Valley Civilization. But the importance of Dholavira is much wider than these basic facts. The importance of Dholavira can be gauged from the fact that it is the first such site of Harappan civilization in India which has been given this status. Prior to this, only one site of Indus Valley Civilization ‘Mohenjodaro’ was declared as a World Heritage Site but at present it is in Sindh province of Pakistan. Not only this, Harappa, the most famous and first discovered site of Indus Valley Civilization, is yet to get the title of World Heritage Site.

Dholavira is situated between two streams named Mansar and Manhar on Khadir Bet Island in the middle of a sea of ​​sand in the Great Rann of Kutch. It is estimated that 5000 years ago, the water level of the Rann was so high that sea boats used to reach this place directly while moving from the coast. Being situated near the Tropic of Cancer, its geography becomes even more interesting. After going a few miles from here, we also reach the India-Pakistan border.

Dholavira is the largest site of Indus civilization after Rakhigarhi in India. The whole world came to know about it only in the 60s when it was discovered by archaeologist Jagpati Joshi, but extensive excavation of this site was done in 1990 by R.S. It was done by Bist only after which we came to know that about 5 thousand years ago it was one of the busiest metropolis of India. It was a major trading center. This is the reason why a historian has called it the ‘city of moneylenders’. Unlike other Harappan cities, this city was divided into three parts – the fort (garhi), the middle city and the lower city. Apart from this, the remains of some settlements have also been found around its boundary wall, which has been called suburb. Dholavira has the characteristics of better town planning and better drainage and sewage system, but what makes it a special place in comparison to other sites is its better water harvesting or water management system. This area used to come in the semi-arid region where the amount of rainfall was less than average, but still due to their water harvesting technology, there was no shortage of water for such a big city. Here, with the help of stones, a series of reservoirs were made for the harvesting of rain water.

A ten-letter information board has also been found from Dholavira, which is the largest of all the inscriptions found in the Indus Valley Civilization. Archaeologist and Dholavira excavator R.S. Bisht has called it ‘the oldest sign board in the world’. What is written on this sign board is not known yet because the allegorical script inscribed on it has not been read yet.

The cultural journey of Dholavira was inextricably linked with each other passing through several stages. It is estimated that the journey of Dholavira civilization was about 1000 years.

️First stage of civilization

The first stage of the Dholavira civilization gives an impression that the people who settled here had brought with them a fully developed civilization. On the basis of archaeological evidence, it is being speculated that the people who settled here probably came from Sindh and Balochistan. The inhabitants of the first stage of civilization made pottery, refining copper, carving stones, beading of up-gems, selkhadi, conch shells etc. The people of this civilization used clay bricks cast in molds of fixed size. Evidence has also been found of the use of stones in limited quantities along with bricks. Built in rectangular shape, the 11 meter thick bricks were built around the settlement.

second stage of civilization

In the second phase of the civilization, the inner side of the ‘fort wall’ was increased by 3 meters in width. The ramparts were made of raw bricks. In the inner part of the wall, about 13 layers of white, pink, dark pink clay have been coated. Similar soil has been used for plastering the inside and outside walls of the building.

️The third stage of civilization

The third phase of civilization was also done with the expansion of the inner wall about four and a half meters wide to strengthen the ‘wall of the fort’.

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