HINDUISM AND SANATAN DHARMA

Cosmos ,Sanatan Dharma.Ancient Hinduism science.

Love story of Man Singh Tomar and Gurjar Mrignayani #mansinghtomar #rajput

-इतिहास कि अनोखी प्रेम कहानी और क्षत्रियों का उत्द्धरण

ये चित्र ग्वालियर के गूजरी महल का है जो इतिहास कि शानदार इमारतो में से एक हैं ।

राजपूत राजा राजा मान सिहं तोमर और गुज्जर जाति कि एक आम लडकी ‘ मृगनयनी ‘ की ।
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उन दिनों अक्सर मुगलों के आक्रमण होते रहते थे। सिकन्दर लोदी और गयासुद्दीन खिलजी ने कई बार ग्वालियर के किले पर धावा किया, पर वे सफल न हो सके। तब उन्होने आसपास के गांवो को नष्ट कर उनकी फसलें लूटना शुरू कर दिया। उन्होने कई मन्दिरों को तोड-फोड डाला और लोगों को इतना तंग किया कि वे हमेशा भयभीत बने रहते। खासकर स्त्रियों को बहुत ही भय रहता। उन दिनों औरतों का खूबसूरत होना खतरे से खाली न रहता। कारण, मुगल उनपर आंखें लगाए रहते थें। गांवों की कई सुन्दर, भोली लडकिंया उनकी शिकार हो चुकी थी।
ऐसे समय में ग्वालियर के पास राई नामक गांव में एक गरीब गुज्जर किसान के यंहा निन्नी नामक एक सुन्दर लडकी थी। सिकन्दर लोदी के आक्रमण के समय उसके माता-पिता मारे गए थें और अब एक भाई के सिवा उसका संसार में कोई न था। वहीं उसकी रक्षा और भरण-पोषण करता था। उनके पास एक कच्चा मकान और छोटा-सा खेत था, जिसपर वे अपनी गुजर करते थे। दोनों भाई-बहिन शिकार में निपुण थें और जंगली जानवार मारा करते थे। दोनों अपनी गरीबी में भी बडे खुश रहते और गांव के सभी सामाजिक और धार्मिक कार्यों में हिससा लेते रहते थे। उनका स्वभाव और व्यवहार इतना अच्छा था कि पूरा गांव उन्हे चाहता था।

धीरे-धीरे निन्नी के अनुपम भोले सौन्दर्य की खबर आसपास फैलने लगी और एक दिन मालवा के सुल्तान गयासुद्दिन को भी इसका पता लग गया। वह तो औरत और शराब के लिए जान देता ही था। उसने झट अपने आदमियों को बुलवाया और राई गांव की खूबसूरत लडकी निन्नी गूजरी को अपने महल में लाने के लिए हुक्म दिया। अन्त में दो घुडसवार इस काम के लिए चुने गए। सुल्तान ने उनसे साफ कह दिया कि यदि वे उस लडकी को लाने में कामयाब न हुए तो उनका सिर धड से अलग कर दिया जाएगा। और यदि वे उसे ले आए तो उन्हें मालामाल कर दिया जाएगा।
निन्नी गूजरी अपनी एक सहेली के साथ जंगल में शिकार को गई थी। उस दिन शाम तक उन्हें कोई शिकार नहीं मिला और वे निराश होकर लौटने ही वाली थी कि उन्हे दूर झाडी के पास कुछ आहट सुनाई दी। लाखी थककर चूर हो गई थी इसलिए वह तो वहीं बैठ गई, किन्तु निन्नी अपने तीर और भालों के साथ आगे बढ गई। झाडी के पास पहूंचने पर उसने शिकार की खोज की, पर उसे कुछ नजर नहीं आया। वह लौटने ही वाली थी कि फिर से आहट मिली। उसने देखा कि झाडी के पास एक बडे झाड के पीछे से दो घुडसवार निकले और उसकी ओर आने लगे। पहले तो निन्नी कुछ घबराई, किन्तु फिर अपना साहस इकट्ठा कर वह उनका सामना करने के लिए अडकर खडी हो गई। जैसे ही घुडसवार उससे कुछ कदम दूरी पर आए, उसने कडकती हुई आवाज हुई आवाज में चिल्लाकर कहा, तुम कौन हो और यहाँ क्यों आए हो ? दोनों सवार घोडो पर से उतर गए। उनमें से एक ने कहा, हम सुल्तान गयासुद्दीन के सिपाही है, और तुम्हे लेने आए हैं। सुल्तान तुम्हे अपनी बेगम बनाना चाहता है। सवार के मुंह से इन शब्दों के निकलते ही निन्नी ने अपना तीर कमान पर चढा उसकी एक आँख को निशाना बना तेजी से फेंका। फिर दूसरा तीर दूसरी आँख पर फेंका, किन्तु वह उसकी हथेली पर अडकर रह गया, क्योंकि सवार के दोनों हाथ आखों पर आ चुके थे। इसी बीच दूसरा सवार घोडे पर चढकर तेजी से वापस लौटने लगा। निन्नी ने उसपर पहले भाले से और फिर तीरों से वार किया। वह वहीं धडाम से नीचे गिर गया। पहले सवार की आंखों से रक्त बह रहा था। निन्नी ने एक भाला उसकी छाती पर पूरी गति से फेंका और चीखकर वह भी जमीन पर लोटने लगा। फिर निन्नी तेजी से वापस चल पडी और हांफती हुई लाखी के घर पहुंची। लाखी पास के नाले से पानी पीकर लौटी थी और आराम कर रही थी। निन्नी से घुडसवारों का हाल सुन, उसके चेहरे का रंग उड गया। किन्तु निन्नी ने उसे हिम्मत दी और शिघ्रता से वापस चलने को कहा।

दूसरे दिन पूरे राई गांव में निन्नी की बहादुरी का समाचार बिजली की तरह फैल गया। ग्वालियर के राजपूत राजा मानसिंह तोमर को भी इस घटना की सूचना मिली। वे इस बहादुर लडकी से मिलने के लिए उत्सुक हो उठे। उसके बाद तो जो भी आदमी राई गांव से आते वे इस लडकी के बारे में अवश्य पूछते। एक दिन गांव का पूजारी मन्दिर बनवाने की फरियाद ले मानसिंह के पास पहुंचा। उसने भी निन्नी की वीरता के कई किस्से राजा को सुनाए। राजा को यह सुनकर बडा आश्चर्य हुआ कि निन्नी अकेली कई सूअरों और अरने-भैंसों को केवल तीरों और भालों से मार गिराती है। अन्त में मानसिंह ने पुजारी के द्वारा गांव में संदेशा भेज दिया कि वे शीघ्र ही गांव का मन्दिर बनवाने और लोगों की हालत देखने राई गांव आएंगे।

राजा के आगमन की सूचना पाते ही गूजरों में खुशी की लहर फैल गई। हर कोई उनके स्वागत की तैयारियों में लग गया। लोगों ने अपने कच्चे मकानों को छापना और लीपन-पोतना शुरू कर दिया। जिनके पास पैसे थे उन्होने अपने लिए उस दिन पहनने के लिए एक जोडा नया कपड बनवा लिया। किन्तु जिनके पास पैसे नहीं थे उन्होने भी नदी के पानी में अपने पुराने फटे कपडों को खूबसाफकर लिया और उत्सुकता से उस दिन की राह देखने लगे। आखिर वह दिन आ ही गया। उस दिन हर दरवाजे पर आम के पतो के बंदनवार बांाधे गए और सब लोग अपने साफ कपडो को पहन, गांव के बाहर रास्ते पर राजा के स्वागत के लिए जमा हो गए। सामने औरतों की कतारें थी। वे अपने सिर पर मिटी के घडे पानी से भरकर रखे थी। और उनपर मीठे तेल के दीये जल रहे थे। सबके सामने निन्नी को खडा किया गया था, जो एक थाली में अक्षत, कुमकुम, फूल और आरती उतारने के लिए घी का एक दीया रखे हुए थी। उसने मोटे, पर साफ कपडे पहने थे। उसके बाजू से गांव का पुजारी था तथा बाकी पुरूष पंक्ति बनाकर औरतों के पीछे खडे हुए थे। जैसे ही राजा की सवारी पहुंची, पूरे गांव के लोगों ने मिलकर एक स्वर से उनकी जय-जयकार की। फिर पुजारी ने आगे बढकर पहले उनका स्वागत किया। उनके भाल पर हन्दी और कुमकुम का टीका लगाया और माला पहनाई। राजा ने ब्राहण के पैर छुए और पुजारी ने उन्हें आर्शीवाद दिया। इसके बाद पुजारी ने राजा को निन्नी का परिचय दिया। निन्नी सिर झुकाए खडी थी। उसने झट कुमकुम, अक्षत राजा के माथे पर लगाया। फूल उनकी पगडी पर फेंके और आरती उतारने लगी। मानसिंह की दृष्टि निन्नी के भोले चेहरे पर अटकी हुई थी। आरती समाप्त होते ही मानसिंह ने देखा कि निन्नी के फेंके फूलों मे से एक जमीन पर गिर पडा हैं। उन्होने झुककर उसे उठाया और अपनी पगडी में खोंस लिया। कई स्त्रियों ने यह दृश्य देखा और आपस में एक दूसरे की तरफ देखते हुए मुस्कराने लगी। विशेषकर लाख चुप न रह सकी और उसने निन्नी को चिमटी देकर चुफ से कान में कह हि दिया-’’राजा ने तुम्हारी पूजा स्वीकार कर ली हैं। अब तो तू जल्दी ही ग्वालियर की रानी बनेगी।‘‘ निन्नी के गोरे गालों पर लज्जा की लालिमा छा गई। ‘चल हट!‘ कहकर वह भीड में खो गई और राजा मन्दिर की ओर चल पडे।

मन्दिर के पास ही राजा का पडाव डाला गया। रात्रि के समय लोगों की सभा में राजा ने मन्दिर बनवाने के लिए पांच हजार रुपयों के दान की घोषणा की। गांव में कुआं खुदवाने तथा सडक सुधारने के लिए दस हजार रुपये देने का वायदा किया। अंत में राजा ने गांव के लोगों को मुगलों से सतर्क रहने और उनका सामना करने के लिए तैयार रहने को कहा। उन्होंने सबके सामने निन्नी की सुनी हुई बहादुरी की भी तारीफ की और दूसरे दिन निन्नी के जंगली जानवरों के शिकार को देखने की इच्छा प्रकट की। पुजारी ने निन्नी के भाई अटल की ओर इशारा किया। अटल ने बिना निन्नी से पूछे खडे होकर स्वीकृति दे दी। इसके बाद बहुत रात तक भजन-कीर्तन हुआ और फिर लोग अपने-अपने घर चले गए।

दुसरे दिन शिकार की तैयारियां हुई। राजा मानसिंह के लिए एक मचान बनाया गया। निन्नी ने अपने सब हथियार साफ करके उन्हें तेज किया। बीच-बीच में निन्नी विचारों में खो जाती। कभी ग्वालियर की रानी बनने की मधुर कल्पना उसे गुमशुदा जाती तो कभी अपने एकमात्र प्रिय भाई का ख्याल, गांव का सुखी, स्वतंत्र जीवन, सांक नदी का शीतल जल, और जंगल के शिकार का आनन्द उसे दूसरे संसार में ले जाते। इसीसमय अटल ने तेजी से घर में प्रवेश किया और निन्नी को जल्दी चलने के लिए कहा। राजा ने जंगल की ओर निकल चुके थं। इसी समय लाखी भी आ गई और निन्नी लाखी के साथ शिकार के लिए चल पडी। कुछ हथियार निन्नी रखे थी और कुछ उसने लाखी को पकडा दिए थे।

जंगल में राजा के आदमी ढोल पीट रहे थे, ताकि जानवर अपने छिपे हुए स्थानों से बाहर निकल पडें। राजा मानसिंह मचान पर बैठे थे। निन्नी और लाखी एक बडे झाड के नीचे खडी हुई थी। थोडी देर के बाद हिरण-परिवार झाडी से निकला और भागने लगा। निन्नी ने एक तीर जोर से फेंका, जो मादा हिरण को लगा, और वही वगिर पडी। नरहिरण तेजी से भगा, पर निन्नी ने उसे भी मार गिराया । इसके बाद निनी ने दौडकर दो हिरण के बच्चों ाके , जो अकेले बच गए थे, उठा लिया और गोद में रखकर झाड के नीचे ले आई। मानसिंह ने यह दृश्य देखा और मन ही मन निन्नी के कोमल हदय की प्रशंसा करने लगे। इसके बाद तो एक-एक करके कई जंगली जानवर बाहर निकले और निनी ने कभी तरों और कभी भलों से उन्हे पहले ही प्रयत्न में मार गिराया। फिर एक बडा जंगली अरना भैंसा निकला। निनी ने पूरी ताकत से दो तीर फेंके, जो सीधे भैंस के शरीर को भेद गए। किन्तु वह गिरा नहीं। घायल होने के कारण वह क्रोध में आकर चिघाडता हुआ निन्नी की ओर झपटा। मानसिंह ने अपनी बदूंक निकाल ली और वे भैंसे पर गोली चलाने ही वाले थे कि उन्होंने देखा-निन्नी ने दौडकर अरने भैसें के सींग पकड लिए है और पूरा जोर लगाकर वह उन्हे मरोड रही है। फिर बिजली की सी गति से उसने एक तेज भाला उसके माथे पर भोंक दिया। भैंसा अतिंम बार जोर से चिघाडा और जमीन पर गिर पडा।

मानसिंह मचान से उतरे और सीधे निनी के पास गए। उन्होंने अपने गले से कीमती मोती की माला उतारी और उसे निन्नी के गले में पहना दी। निन्नी ने झुककर राजा को प्रणाम किया और एक ओर हो गई। लाखी ने देखा, राजा और निन्नी चुप खडे हैं। वह जानवरों के शरीरों से तीर और भाले निकालने का बहाना कर वहंा से खिसक गई। तब मानसिंह ने निन्नी का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, ’’शक्ति और सौन्दर्य का कैसा सुन्दर मेल है तुममें ! निन्नी, सचमुच तुम तो ग्वालियर के महल मे ही शोभा दोगी। क्या तुम मुझसे विवाह करने के लिए तैयार हो?‘‘ निन्नी के पास जवाब देने के लिए शब्द ही नहीं थें। वह क्षण भर मोन रही ! फिर अत्यंत नम्र और भोले स्वर में बोली-’’ फिर मुझे गांव का यह सुन्दर स्वतंत्र जीवन कहां मिलेगा ! वहां मुझे शिकार के लिए जंगल और जानवर कहां मिलेंगे; और यह सांक नदी; जिसका शीतल जल मुझे इतना प्यारा लगता है वहां कहां मिलेगा? मानसिंह जो निन्नी का हाथ अभी भी अपने हाथों में रखे थे, बोले, ’’तुम्हारी सब इच्छाए वहां भी पूरी होगी। निन्नी, केवल वचन दो, मैं तुम्हारे लिए सांक नदी को ग्वालियर के महल तक ले जा सकता हूँ।‘‘ निन्नी अब क्या कहती। वह चुप हो गई। और मानसिंह उसके मौन का अर्थ समझ गए। इसी समय अटल और अन्य लोग वहां पहुंचे और निन्नी का हाथ छोड राजा मानसिंह उनमें मिल गए।

उसी दिन संध्या समय मानसिंह ने पुजारी के द्वारा अटल गुज्जर के पास निन्नी से विवाह का प्रस्ताव भेजा। पहले अटल विश्वास न कर सका, किन्तु जब स्वंय मानसिंह ने उससे विवाह की बात कही, तब तो अटल की खुशी का ठिकाना न रहा। दूसरे ही दिन विवाह होना था। अटल इंतजाम मे लग गया। लोग उससे पूछते कि वह पैसा कहाँ से लाएगा और इतना बडा ब्याह कैसे करेगा? अटल गर्व से जवाब देता, ’’मै कन्या दूंगा और एक गाय दूंगा। सूखी हल्दी और चावल का टीका लगाऊगा। घर में बहुत से जानवरों के चमडे रखे हैं उन्हे बेचकर बहन के गले के लिए चांदी की एक हसली दुंगा और क्या चाहिए?‘‘ मानसिंह ने अटल की कठिनाईया सुनी तो उसे सदेंशा भेजा कि वे ग्वालियर से शादि करने को तैयार है और दोनों तरफ का खर्चा भी वे पूरा करेंगे।इससे अटल के स्वाभिमान को बड धक्का पहुंचा। उसने तुरन्त संदेशा भेजा कि उसे यह बात मंजूर नहीं। आज तक कहीं ऐसा नहीं हुआ कि लडकी को लडके के घर ले जाकर विवाह किया गया हो गरीब से गरीब लडकी वाले भी अपने घर में ही लडकी का कन्यादान देते हैं। इस पर मानसिंह चुप हो गए।
अटल ने रात भर जागकर सब तैयारिया की। उसने जंगल से लडकी और आम के पते लाकर मांडप बनाया अनाज बेचकर कपडे का एक जोडा निन्नी के लिए तैयार किया तथा गांव वालों ाके बांटने के लिए गुड लिया। इस तरह दूसरे दिन वैदिक रीति से राजा मानसिंह और निन्नी का ब्याह पूरा हुआ। गांव के लोगों से जो कुछ बन पडा उन्होने निन्नी को दिया। विदा के समय निन्नी अटल से लिपटकर खूब रोई। उसने रोते हुए कहा, ’’भैया अब लाखी को भाभी बनाकर जल्दी घर ले आओं तुम्हे बहुत तकलीफ होगी।‘‘ भाई ने उसे आश्वासन दिया और इस प्रकार निनी भाई की झोपडी को छोड ग्वालियर के महल के लिए रवाना हो गई।
विवाह के बाद महल कि राजपूत राणियो ने गुज्जर जाति कि रानि का विरोध किया इसी कारण राणा जी मे ” गुजरी महल ” का निर्माण करवाया ।

यही गूजर किसान की लडकी निन्नी, जिसका नाम असल में मृगनयनी था, ग्वालियर की गूजरी रानी के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध हुई। उसमें जैसी सौन्दर्य की कोमलता थी, वैसी ही शूर वीरता भी थी। राजा मानसिंह उसे बहुत ही चाहते थे और कुछ समय तक ऐसा लगा कि राजा उसके पीछे पागल है किन्तु निन्नी ने उन्हे हमेशा कर्तव्य कि और प्रेरित किया वह सव्य संगित व चित्रकला सिखने लगी जिससे उसका समय व्यस्त रहता और मानसिंह भी उस समय अपने राज्य के कार्यो में लगे रहते युद्व के समय निन्नी हमेशा मानसिंह को उत्साहित कर प्रजा के रक्षा के लिए तत्पर रहती इस प्रकार निन्नी सचमुच एक योग्य कुशल रानी सिद्व हुई उसने राज्य में सगींत, चित्र, कला, शिल्पकला को प्रोत्साहन करना बैजू नामक प्रसिद्व गायक ने किसी समय नई-नई राग-रागिनाए बनाई थी ग्वालियर में बने हुए मान मन्दिर और गूजरी महल आज भी उस समय की उन्नत शिल्पकला के नमूने है राई गांव से गूजरी महल तक बनी हुई नहर जिसमें सांक नदी का जल ग्वालियर तक ले जाया गया था आज भी दिखाई देता है।

इनके पुत्र को क्षत्रिय राजपूतों मे शामिल नहीं किया । क्योकि क्षत्रिय वो है जो एक क्षत्राणि की कोख से जन्मा हो।
मृगनयनी से दो पुत्र हुए जिन्हें लेकर गुर्जरी महल छोड़ टिगड़ा के जंगलो में चली गयी उन्होंने एक नया गोत्र अपनाया जो आज गुर्जुर में आता है …^तोंगर^ जिसका अर्थ यह है
तोमर+गुर्जर = तोंगर
इसलिए मृग्नयनि पुत्र को कुछ जागीर देकर गूजरों मे शामिल किया गया।
ये राजपूत राजा मानसिंह तोमर के गूजरी पत्नी के वंशज आज तोंगर गुज्जर कहलाते हैं और तोमर राजपूतो को चुनाव में समर्थन कर उनके प्रति सम्मान दिखाते हैं।

इसी तरह राजपूत पुरुशों के दूसरी जाति की महिल/सम्बन्ध से उन जातियों में चौहान तोमर गहलौत परमार सोलँकि वंश चले हैं।ये राजपूतों की उदारता को भी प्रदर्शित करता है।
इस प्रकार राजपूत राजा की गूजरी रानी निन्नी/मृगनयनी ने ग्वालियर के तौमर राज्य में चार चांद जोड दिए और उस काल को इतिहास में अमर कर दिया।

नोट-हिसार हरियाणा का गूजरी महल एक मुस्लिम सुल्तान ने अपनी गूजरी प्रेमिका के लिए बनवाया था वो ग्वालियर के गूजरी महल से अलग है।इसमें भृमित न हों।
सन्दर्भ-khabarexpress.com

16 comments on “Love story of Man Singh Tomar and Gurjar Mrignayani #mansinghtomar #rajput

  1. yash pratap singh
    November 2, 2016

    ek dam sahi jankari

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  2. Rahul singh
    May 23, 2017

    काफी अच्छी कहानी लिखी है मगर कहानी काम स्त्रोत क्या है?
    आपने गुर्जर को क्षत्रिय क्यों नहीं माना? जबकि इसी ग्वालियर किले काम निर्माण गुर्जर सम्राटों ने कराया था। तोमर तो खुद गुर्जर थे। आप राजपूतों को ऊपर लिखा रहे हैं और गुर्जरों को नीचा। जबकि कई इतिहासकार साबित कर चुके हैं कि राजपूतों की उत्पत्ति गुर्जरों से है।

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    • Babloo Singh gurjar
      November 10, 2017

      Gurjar bhi to Kshatriya hi h galat Kyun likh rHe ho aap

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  3. Patel Sachin Bhadana
    June 5, 2017

    राजपूतो की उत्पत्ति गुर्जर प्रतिहार वंस से हुई है।

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  4. Vijay panwar
    September 21, 2017

    Bhai gurjar jati to bahut pahle se h.rajputo se pahle Rajasthan or Gujarat pr gurjaro ka Raj tha.Gurjar se baad long Kshatriya h.

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  5. Nilesh Chaudhary
    November 9, 2017

    gurjar king+ janna=rajput.rajput status is below kshtriya.gurjar are kshtriya..u can read rajput wikipedia

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  6. Nilesh Chaudhary
    November 9, 2017

    However, recent research suggests that the Rajputs came from a variety of ethnic and geographical backgrounds.[11] The root word “rajaputra” (literally “son of a king”) first appears as a designation for royal officials in the 11th century Sanskrit inscriptions. According to some scholars, it was reserved for the immediate relatives of a king; others believe that it was used by a larger group of high-ranking men.[12] Over time, the derivative term “Rajput” came to denote a hereditary political status, which was not necessarily very high: the term could denote a wide range of rank-holders, from an actual son of a king to the lowest-ranked landholder.[13] Before the 15th century, the term “Rajput” was associated with people of mixed-caste origin, and was therefore considered inferior in rank to “Kshatriya”.[14]

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  7. Nilesh Chaudhary
    November 9, 2017

    gurjar is king.

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  8. Vishal singh
    November 20, 2017

    Please write an article about love story between nirbhay singh gurjar and seema parihar too.

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  9. Vishal singh
    November 20, 2017

    By the way historians (and not bards) both indian and foreigners like James Todd,john keay,denzil ibbetson,aydogdy kurbanov ,irawati karve,baij nath Puri, brij kishore sharma,d b bandarkar,people of india(anthropogical survey of india),ur own thakur yashpal singh rajpoot etc etc..believe many of the rajput clans including Tomars or tanwar came out of gurjars ckans

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    • Devendra
      January 7, 2018

      @ Vishal Singh bards are parts of our culture not historians
      They are doing there jobs when their is no one such historians
      It’s true that there is maan singh and his wife mrignayani
      Who is gujjar by caste and marryied to raja maan Singh Tomar
      She has value more to his husband then anyone has
      But she is also famous for their power and valour..
      Due fact is that both caste have their significant role in History and culture of our country

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  10. Anuj Chhokar
    November 23, 2017

    This writer is more influence with Rajputs. He is using respect full words for Rajputs than Gurjars. I think he is not aware about real history. Gurjar words come before Rajputs in this univers. Such type of political writer give wrong information in front of society. In this world many more monuments are upon the name of Gurjars which clearly shows that Gurjars are the foremost people in this earth.

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    • Sanatan Dharm and Hinduism
      November 23, 2017

      They are same and were brave fighters. Stop dividing Hindus. This article was meant for one special purpose for Raja Maan Singh Tomar. Writer is certainly influenced with spiritual Hinduism not a blind and uneducated like you.

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  11. Devendra
    January 7, 2018

    Everyone here or anywhere we are child of our lord from one family Hindu Dharma.
    We are the branches of a vast tree ..
    We all brother s and sisters ..
    Lets not divide on caste line.
    Oh son of hindus wake up from deep sleep please take lessons from past

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This entry was posted on January 15, 2015 by in HISTORY OF INDIA, rajput history and tagged , , .

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