HINDUISM AND SANATAN DHARMA

Hinduism,Cosmos ,Sanatan Dharma.Ancient Hinduism science.

BIHAR,YUGAS,LOKAS

१. पौराणिक इतिहास भूगोल-(१) कालमान (क) ज्योतिषीय काल-बिहार के प्राचीन नामों को जानने के लिये पुराणों का प्राचीन इतिहास भूगोल समझना पड़ेगा। अभी २ प्रकार से ब्रह्मा का तृतीय दिन चल रहा है। ज्योतिष में १००० युगों का एक कल्प है जो ब्रह्मा का एक दिन है। यहां युग का अर्थ है सूर्य से उसके १००० व्यास दूरी (सहस्राक्ष क्षेत्र) तक के ग्रहों (शनि) का चक्र, अर्थात् १ युग में इनकी पूर्ण परिक्रमायें होती हैं। आधुनिक ज्योतिष में भी पृथ्वी गति का सूक्ष्म विचलन जानने के लिये शनि तक के ही प्रभाव की गणना की जाती है। भागवत स्कन्ध ५ में नेपचून तक के ग्रहों का वर्णन है जिसे १०० कोटि योजन व्यास की चक्राकार पृथ्वी कहा गया है। इसका भीतरी ५० कोटि योजन का भाग लोक = प्रकाशित है, बाहरी अलोक भाग है। इसमें पृथ्वी के चारों तरफ ग्रह-गति से बनने वाले क्षेत्रों को द्वीप कहा गया है जिनके नाम वही हैं जो पृथ्वी के द्वीपों के हैं। पृथ्वीके द्वीप अनियमित आकार के हैं, सौर-पृथ्वी के द्वीप चक्राकार (वलयाकार) हैं। द्वीपों के बीच के भागों को समुद्र कहा गया है। पृथ्वी का गुरुत्व क्षेत्र जम्बूद्वीप, मंगल तक के ठोस ग्रहों का क्षेत्र दधि समुद्र आदि हैं। १००० युगों के समय में प्रकाश जितनी दूर तक जा सकता है वह तप लोक है तथा वह समय (८६४ कोटि वर्ष) ब्रह्मा का दिन रात है। इस दिन से अभी तीसरा दिन चल रहा है अर्थात् १७२८ कोटि वर्ष के २ दिन-रात बीत चुके हैं तथा तीसरे दिन के १४ मन्वन्तरों (मन्वन्तर = ब्रह्माण्ड या आकाश गंगा का अक्षभ्रमण काल) में ६ बीतचुके हैं, ७वें मन्वन्तर के ७१ युगों में २७ बीत चुके हैं तथा २८ वें युग के ४ खण्डों में ३ बीत चुके हैं-सत्य, त्रेता, द्वापर (ये ४३२,००० वर्ष के कलि के ४, ३, २ गुणा हैं)। चतुर्थ पाद युग कलि १७-२-३१०२ ई.पू. से चल रहा है।
(ख) ऐतिहासिक काल-ऐतिहासिक युग चक्र ध्रुवीय जल प्रलय के कारण होता है जो १९२३ के मिलांकोविच सिद्धान्त के अनुसार २१६०० वर्षों का चक्र है। यह २ गतियों का संयुक्त प्रभाव है-१ लाख वर्षों में पृथ्वी की मन्दोच्च गति तथा विपरीत दिशा में २६,००० वर्ष में अयन गति (पृथ्वी अक्ष की शंकु आकार में गति-ब्रह्माण्ड पुराण का ऐतिहासिक मन्वन्तर-स्वायम्भुव मनु से कलि आरम्भ तक )। भारत में मन्दोच्च गति के दीर्घकालिक अंश ३१२,००० वर्ष चक्र को लिया गया है। इसमें २४,००० वर्षों का चक्र होता है, जिसमें १२-१२ हजार वर्षों का अवसर्पिणी (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि क्रम में) तथा उत्सर्पिणी (विपरीत क्रम में युग खण्ड) भाग हैं। प्रति अवसर्पिणी त्रेता में जल प्रलय तथा उत्सर्पिणी त्रेता में हिम युग आता है। तृतीय ब्रह्माब्द का अवसर्पिणी वैवस्वत मनु काल से आरम्भ हुआ, जिसके बाद ४८०० वर्ष का सत्य युग, ३६०० वष का त्रेता तथा २४०० वर्ष का द्वापर १७-२-३१०२ ई.पू में समाप्त हुये। अर्थात् वैवस्वत मनु का काल १३९०२ ई.पू. था। अवसर्पिणी कलि १२०० वर्ष बाद १९०२ ई.पू. में समाप्त हुआ। उसके बाद उत्सर्पिणी का कलि ७०२ ई.पू. में, द्वापर १६९९ ई. में पूर्ण हुआ। अभी १९९९ ई. तक उत्सर्पिणी त्रेता की सन्धि थी अभी मुख्य त्रेता चलरहा है। त्रेता को यज्ञ अर्थात् वैज्ञानिक उत्पादन का युग कहा गया है। १७०० ई. से औद्योगिक क्रान्ति आरम्भ हुयी, अभी सूचना विज्ञान का युग चल रहा है। इसी त्रेता में हिमयुग आयेगा। विश्व का ताप बढ़ना तात्कालिक घटना है, दीर्घकालिक परिवर्तन ज्योतिषीय कारणों से ही होगा।
(२) आकाश के लोक-आकाश में सृष्टि के ५ पर्व हैं-१०० अरब ब्रह्माण्डों का स्वयम्भू मण्डल, १०० अरब तारों का हमारा ब्रह्माण्ड, सौरमण्डल, चन्द्रमण्डल (चन्द्रकक्षा का गोल) तथा पृथ्वी। किन्तु लोक ७ हैं-भू (पृथ्वी), भुवः (नेपचून तक के ग्रह) स्वः (सौरमण्डल १५७ कोटि व्यास, अर्थात् पृथ्वी व्यास को ३० बार २ गुणा करने पर), महः (आकाशगंगा की सर्पिल भुजा में सूर्य के चतुर्दिक् भुजा की मोटाई के बराबर गोला जिसके १००० तारों को शेषनाग का १००० सिर कहते हैं), जनः (ब्रह्माण्ड), तपः लोक (दृश्य जगत्) तथा अनन्त सत्य लोक।
(३) पृथ्वी के तल और द्वीप-इसी के अनुरूप पृथ्वी पर भी ७ तल तथा ७ लोक हैं। उत्तरी गोलार्द्ध का नक्शा (नक्षत्र देख कर बनता है, अतः नक्शा) ४ भागों में बनता था। इसके ४ रंगों को मेरु के ४ पार्श्वों का रंग कहा गया है। ९०-९० अंश देशान्तर के विषुव वृत्त से ध्रुव तक के ४ खण्डों में मुख्य है भारत, पश्चिम में केतुमाल, पूर्व में भद्राश्व, तथा विपरीत दिशा में उत्तर कुरु। इनको पुराणों में भूपद्म के ४ पटल कहा गया है। ब्रह्मा के काल (२९१०२ ई.पू.) में इनके ४ नगर परस्पर ९० अंश देशान्तर दूरी पर थे-पूर्व भारत में इन्द्र की अमरावती, पश्चिम में यम की संयमनी (यमन, अम्मान, सना), पूर्व में वरुण की सुखा तथा विपरीत में चन्द्र की विभावरी। वैवस्वत मनु काल के सन्दर्भ नगर थे, शून्य अंश पर लंका (लंका नष्ट होने पर उसी देशान्तर रेखा पर उज्जैन), पश्चिम में रोमकपत्तन, पूर्व में यमकोटिपत्तन तथा विपरीत दिशा में सिद्धपुर। दक्षिणी गोलार्द्ध में भी इन खण्डों के ठीक दक्षिण ४ भाग थे। अतः पृथ्वी अष्ट-दल कमल थी, अर्थात् ८ समतल नक्शे में पूरी पृथ्वी का मानचित्र होता था। गोल पृथ्वी का समतल नक्शा बनाने पर ध्रुव दिशा में आकार बढ़ता जाता है और ठीक ध्रुव पर अनन्त हो जायेगा। उत्तरी ध्रुव जल भाग में है (आर्यभट आदि) अतः वहां कोई समस्या नहीं है। पर दक्षिणी ध्रुव में २ भूखण्ड हैं-जोड़ा होने के कारण इसे यमल या यम भूमि भी कहते हैं और यम को दक्षिण दिशा का स्वामी कहा गया है। इसका ८ भाग के नक्शे में अनन्त आकार हो जायेगा अतः इसे अनन्त द्वीप (अण्टार्कटिका) कहते थे। ८ नक्शों से बचे भाग के कारण यह शेष है।
भारत भाग में आकाश के ७ लोकों की तरह ७ लोक थे। बाकी ७ खण्ड ७ तल थे-अतल, सुतल, वितल, तलातल, महातल, पाताल, रसातल।
वास्तविक भूखण्डों के हिसाब से ७ द्वीप थे-जम्बू (एसिया), शक (अंग द्वीप, आस्ट्रेलिया), कुश (उत्तर अफ्रीका), शाल्मलि (विषुव के दक्षिण अफ्रीका), प्लक्ष (यूरोप), क्रौञ्च (उत्तर अमेरिका), पुष्कर (दक्षिण अमेरिका)। इनके विभाजक ७ समुद्र हैं।
(४) धाम-आकाश के ४ धाम हैं-अवम (नीचा) = क्रन्दसी-सौरमण्डल, मध्यम = रोदसी-ब्रह्माण्ड, उत्तम या परम (संयती)-स्वयम्भू मण्डल, परात्पर-सम्पूर्ण जगत् का अव्यक्त मूल। इनके जल हैं-मर, अप् या अम्भ, सलिल (सरिर), रस। इनके ४ समुद्र हैं-विवस्वान्, सरस्वान्, नभस्वान्, परात्पर। इनके आदित्य (आदि = मूल रूप) अभी अन्तरिक्ष (प्रायः खाली स्थान) में दीखते हैं-मित्र, वरुण, अर्यमा, परात्पर ब्रह्म। इसी के अनुरूप पृथ्वी के ४ समुद्र गौ के ४ स्तनों की तरह हैं जो विभिन्न उत्पाद देते हैं-स्थल मण्डल, जल मण्डल, जीव मण्डल, वायुमण्डल। इनको आजकल ग्रीक में लिथो, हाइड्रो, बायो और ऐटमो-स्फियर कहा जाता है। शंकराचार्य ने ४८३ ई.पू. में इसके अनुरूप ४ धाम बनाये थे-पुरी, शृङ्गेरी, द्वारका, बदरी। ७०० ई. में गोरखनाथ ने भी ४ तान्त्रिक धाम बनाये-कामाख्या, याजपुर (ओडिशा), पूर्णा (महाराष्ट्र), जालन्धर (पंजाब) जिसके निकट गुरुगोविन्द सिंह जी ने अमृतसर बनाया।
(५) भारत के लोक-भारत नक्शे के ७ लोक हैं-भू (विन्ध्य से दक्षिण), भुवः (विन्ध्य-हिमालय के बीच), स्वः (त्रिविष्टप = तिब्बत स्वर्ग का नाम, हिमालय), महः (चीन के लोगों का महान् = हान नाम था), जनः (मंगोलिया, अरबी में मुकुल = पितर), तपः (स्टेपीज, साइबेरिया), सत्य (ध्रुव वृत) इन्द्र के ३ लोक थे-भारत, चीन, रूस। आकाश में विष्णु के ३ पद हैं-१०० व्यास तक ताप क्षेत्र, १००० व्यास तक तेज और उसके बाद प्रकाश (जहां तक ब्रह्माण्ड से अधिक है) क्षेत्र। विष्णु का परमपद ब्रह्माण्ड है जो सूर्य किरणों की सीमा कही जाती है अर्थात् उतनी दूरी पर सूर्य विन्दुमात्र दीखेगा, उसके बाद ब्रह्माण्ड ही विन्दु जैसा दीखेगा। पृथ्वी पर सूर्य की गति विषुव से उत्तर कर्क रेखा तक है, यह उत्तर में प्रथम पद है। विषुव वृत्त तक इसके २ ही पद पूरे होते हैं, तीसरा ध्रुव-वृत्त अर्थात् बलि के सिर पर है।
२. भारत के नाम-(१) भारत-इन्द्र के ३ लोकों में भारत का प्रमुख अग्रि (अग्रणी) होने के कारण अग्नि कहा जाता था। इसी को लोकभाषा में अग्रसेन कहते हैं। प्रायः १० युग (३६०० वर्षों) तक इन्द्र का काल था जिसमें १४ प्रमुख इन्द्रों ने प्रायः १००-१०० वर्ष शासन किया। इसी प्रकार अग्रि = अग्नि भी कई थे। अन्न उत्पादन द्वारा भारत का अग्नि पूरे विश्व का भरण करता था, अतः इसे भरत कहते थे। देवयुग के बाद ३ भरत और थे-ऋषभ पुत्र भरत (प्रायः ९५०० ई.पू.), दुष्यन्त पुत्र भरत (७५०० ई.पू.) तथा राम के भाई भरत जिन्होंने १४ वर्ष (४४०८-४३९४ ई.पू.) शासन सम्भाला था।
(२) अजनाभ-विश्व सभ्यता के केन्द्र रूप में इसे अजनाभ वर्ष कहते थे। इसके शासक को जम्बूद्वीप के राजा अग्नीध्र (स्वयम्भू मनु पुत्र प्रियव्रत की सन्तान) का पुत्र नाभि कहा गया है।
(३) भौगोलिक खण्ड के रूप में इसे हिमवत वर्ष कहा गया है क्योंकि यह जम्बू द्वीप में हिमालय से दक्षिण समुद्र तक का भाग है। अलबरूनी ने इसे हिमयार देश कहा है (प्राचीन देशों के कैलेण्डर में उज्जैन के विक्रमादित्य को हिमयार का राजा कहा है जिसने मक्का मन्दिर की मरम्मत कराई थी)
(४) इन्दु-आकाश में सृष्टि विन्दु से हुयी, उसका पुरुष-प्रकृति रूप में २ विसर्ग हुआ-जिसका चिह्न २ विन्दु हैं। विसर्ग का व्यक्त रूप २ विन्दुओं के मिलन से बना ’ह’ है। इसी प्रकार भारत की आत्मा उत्तरी खण्ड हिमालय में है जिसका केन्द्र कैलास विन्दु है। यह ३ विटप (वृक्ष, जल ग्रहण क्षेत्र) का केन्द्र है-विष्णु विटप से सिन्धु, शिव विटप (शिव जटा) से गंगा) तथा ब्रह्म विटप से ब्रह्मपुत्र। इनको मिलाकर त्रिविष्टप = तिब्बत स्वर्ग का नाम है। इनका विसर्ग २ समुद्रों में होता है-सिन्धु का सिन्धु समुद्र (अरब सागर) तथा गंगा-ब्रह्मपुत्र का गंगा-सागर (बंगाल की खाड़ी) में होता है। हुएनसांग ने लिखा है कि ३ कारणों से भारत को इन्दु कहते हैं-(क) उत्तर से देखने पर अर्द्ध-चन्द्राकार हिमालय भारत की सीमा है, चन्द्र या उसका कटा भाग = इन्दु। (ख) हिमालय चन्द्र जैसा ठण्ढा है। (ग) जैसे चन्द्र पूरे विश्व को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार भारत पूरे विश्व को ज्ञान का प्रकाश देता है। ग्रीक लोग इन्दु का उच्चारण इण्डे करते थे जिससे इण्डिया शब्द बना है।
(५) हिन्दुस्थान-ज्ञान केन्द्र के रूप में इन्दु और हिन्दु दोनों शब्द हैं-हीनं दूषयति = हिन्दु। १८ ई. में उज्जैन के विक्रमादित्य के मरने के बाद उनका राज्य १८ खण्डों में भंट गया और चीन, तातार, तुर्क, खुरज (कुर्द) बाह्लीक (बल्ख) और रोमन आदि शक जातियां। उनको ७८ ई. में विक्रमादित्य के पौत्र शालिवाहन ने पराजित कर सिन्धु नदी को भारत की पश्चिमी सीमा निर्धारित की। उसके बाद सिन्धुस्थान या हिन्दुस्थान नाम अधिक प्रचलित हुआ। देवयुग में भी सिधु से पूर्व वियतनाम तक इन्द्र का भाग था, उनके सहयोगी थे-अफगानिस्तान-किर्गिज के मरुत्, इरान मे मित्र और अरब के वरुण तथा यमन के यम।
(६) कुमारिका-अरब से वियतनाम तक के भारत के ९ प्राकृतिक खण्ड थे, जिनमें केन्द्रीय खण्ड को कुमारिका कहते थे। दक्षिण समुद्र की तरफ से देखने पर यह अधोमुख त्रिकोण है जिसे शक्ति त्रिकोण कहते हैं। शक्ति (स्त्री) का मूल रूप कुमारी होने के कारण इसे कुमारिका खण्ड कहते हैं। इसके दक्षिण का महासागर भी कुमारिका खण्ड ही है जिसका उल्लेख तमिल महाकाव्य शिलप्पाधिकारम् में है। आज भी इसे हिन्द महासागर ही कहते हैं।
(७) लोकपाल संस्था-२९१०२ ई.पू. में ब्रह्मा ने ८ लोकपाल बनाये थे। यह उनके स्थान पुष्कर (उज्जैन से १२ अंश पश्चिम बुखारा) से ८ दिशाओं में थे। यहां से पूर्व उत्तर में (चीन, जापान) ऊपर से नीचे, दक्षिण पश्चिम (भारत) में बायें से दाहिने तथा पश्चिम में दाहिने से बांये लिखते थे जो आज भी चल रहा है। बाद के ब्रह्मा स्वायम्भुव मनु की राजधानी अयोध्या थी, और लोकपालों का निर्धारण भारत के केन्द्र से हुआ। पूर्व से दाहिनी तरफ बढ़ने पर ८ दिशाओं (कोण दिशा सहित) के लोकपाल हैं-इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, मरुत्, कुबेर, ईश। इनके नाम पर ही कोण दिशाओं के नाम हैं-अग्नि, नैर्ऋत्य, वायव्य, ईशान। अतः बिहार से वियतनाम और इण्डोनेसिया तक इन्द्र के वैदिक शब्द आज भी प्रचलित हैं। इनमें ओड़िशा में विष्णु और जगन्नाथ सम्बन्धी, काशी (भोजपुरी) में शिव, मिथिला में शक्ति, गया (मगध) में विष्णु के शब्द हैं। शिव-शक्ति (हर) तथा विष्णु (हरि) क्षेत्र तथा इनकी भाषाओं की सीमा आज भी हरिहर-क्षेत्र है। इन्द्र को अच्युत-च्युत कहते थे, अतः आज भी असम में राजा को चुतिया (च्युत) कहते हैं। इनका नाग क्षेत्र चुतिया-नागपुर था जो अंग्रेजी माध्यम से चुटिया तथा छोटा-नागपुर हो गया। ऐरावत और ईशान सम्बन्धी शब्द असम से थाइलैण्ड तक, अग्नि सम्बन्धी शब्द वियतनाम. इण्डोनेसिया में हैं। दक्षिण भारत में भी भाषा क्षेत्रों की सीमा कर्णाटक का हरिहर क्षेत्र है। उत्तर में गणेश की मराठी, उत्तर पूर्व के वराह क्षेत्र में तेलुगु, पूर्व में कार्त्तिकेय की सुब्रह्मण्य लिपि तमिल, कर्णाटक में शारदा की कन्नड़, तथा पश्चिम में हरिहर-पुत्र की मलयालम।
३. बिहार नाम का मूल-सामान्यतः कहा जाता है कि यहां बौद्ध विहार अधिक थे अतः इसका नाम बिहार पड़ा। यह स्पष्ट रूप से गलत है और केवल बौद्ध भक्ति में लिखा गया है। जब सिद्धार्थ बुद्ध (१८८७-१९०७ ई.पू.) या गौतम बुद्ध (५६३ ई.पू जन्म) जीवित थे तब भी इसे बिहार नहीं, मगध कहते थे। बौद्ध विहार केवल बिहार में ही नहीं, भारत के सभी भागों में थे। मुख्यतः कश्मीर में अशोक के समकालीन गोनन्द वंशी अशोक के समय सबसे अधिक बौद्ध विहार बने थे जिसमें मध्य एसिया के बौद्धों का प्रवेश होने से उन्होंने कश्मीर का राज्य नष्ट-भ्रष्ट कर दिया (राजतरंगिणी, तरंग १)। यह भारत के प्राकृतिक विभाजन के कारण नाम है। आज भी हिमाचल प्रदेश में पहाड़ की ऊपरी भूमि (अधित्यका) को खनेर और घाटी की समतल भूमि (उपत्यका) को बहाल या बिहाल कहते हैं। इसका मूल शब्द है बहल (बह्+क्लच्, नलोपश्च) = प्रचुर, बली, महान्। यथा-असावस्याः स्पर्शो वपुषि बहलश्चन्दनरसः (उत्तररामचरित१/३८), प्रहारैरुद्रच्छ्द्दहनबहलोद्गारगुरुभि (भर्तृहरि, शृङ्गार शतक, ३६)। बहल एक प्रकार की ईख का भी नाम है। खनेर का मूल शब्द है-खण्डल-भूखण्ड, या उसका पालन कर्त्ता। आखण्डल -सभी भूखण्डों का स्वामी इन्द्र। भारत में विन्ध्य और हिमालय के बीच खेती का मुख्य क्षेत्र था। उसमें भी बिहार भाग सबसे चौड़ा और अधिक नदियों (विशेषकर उत्तर बिहार) से सिञ्चित था। अधिक विस्तृत समतल भाग के अर्थ में इसे बहल या विहार (रमणीय) कहते हैं। सबसे अधिक कृषि का क्षेत्र मिथिला था जहां के राजा जनक भी हल चलाते थे। खेती में मुख्यतः घास जाति के धान और गेहूं रोपे जाते हैं, जो एक प्रकार के दर्भ हैं। दर्भ क्षेत्र को दरभंगा कहते हैं। भूमि से उत्पन्न सम्पत्ति सीता है, इसका एक भाग राजा रूप में इन्द्र को मिलता है। अतः यह शक्ति क्षेत्र हुआ। दर्भंगा के विशेष शब्द वही होंगे जो अथर्ववेद के दर्भ तथा कृषि सूक्तों में हैं। यहां केवल खेती है, कोई वन नहीं है। इसके विपरीत विदर्भ में दर्भ बिल्कुल नहीं है, केवल वन हैं। इसका पश्चिमी भाग रीगा ऋग्वेद का केन्द्र था जहां से ज्ञान संस्थायें शुरु हुयीं। ज्ञान का केन्द्र काशी शिव का स्थान हुआ। कर्क रेखा पर गया विष्णुपद तीर्थ या विष्णु खेत्र हुआ। दरभंगा के चारों तरफ अरण्य क्षेत्र हैं-अरण्य (आरा-आयरन देवी), सारण (अरण्य सहित) चम्पारण, पूर्ण-अरण्य (पूर्णिया)। गंगा के दक्षिण छोटे आकार के वृक्ष हैं अतः मगध को कीकट भी कहते थे। कीकट का अर्थ सामान्यतः बबूल करते हैं, पर यह किसी भी छोटे आकार के बृक्ष के लिये प्रयुक्त होता है जिसे आजकल कोकाठ कहते हैं।
उसके दक्षिण में पर्वतीय क्षेत्र को नागपुर (पर्वतीय नगर) कहते थे। इन्द्र का नागपुर होने से इसे चुतिया (अच्युत-च्युत) नागपुर कहते थे। आज भी रांची में चुतिया मोड़ है। घने जंगल का क्षेत्र झारखण्ड है। इनके मूल संस्कृत शब्द हैं-झाटः (झट् + णिच+ अच्)-घना जंगल, निकुञ्ज, कान्तार। झुण्टः =झाड़ी। झिण्टी = एक प्रकार की झाड़ी। झट संहतौ-केश का जूड़ा, झोंटा, गाली झांट।
गंगा नदी पर्वतीय क्षेत्र से निकलने पर कई धारायें मिल कर नदी बनती है। जहां से मुख्य धारा शुरु होती है उस गांगेय भाग के शासक गंगा पुत्र भीष्म थे। जहां से उसका डेल्टा भाग आरम्भ होता है अर्थात् धारा का विभाजन होता है वह राधा है। वहां का शासक राधा-नन्दन कर्ण था। यह क्षेत्र फरक्का से पहले है।
४. राजनीतिक भाग-(१) मल्ल-गण्डक और राप्ती गंगा के बीच।
(२) विदेह-गंगा के उत्तर गण्डक अओर कोसी नदी के बीच, हिमालय के दक्षिण। राजधानी मिथिला वैशाली से ५६ किमी. उत्तर-पश्चिम।
(३) मगध-सोन नद के पूर्व, गंगा के दक्षिण, मुंगेर के पश्चिम, हजारीबाग से उत्तर। प्राचीन काल में सोन-गंगा संगम पर पटना था। आज भी राचीन सोन के पश्चिम पटना जिले का भाग भोजपुरी भाषी है। नदी की धारा बदल गयी पर भाषा क्षेत्र नहीं बदला। राजधानी राजगीर (राजगृह)।
(४) काशी-यह प्रयाग में गंगा यमुना संगम से गंगा सोन संगम तक था, दक्षिण में विन्ध्य से हिमालय तक। इसके पश्चिम कोसल (अयोध्या इसी आकार का महा जनपद था। इसका पूर्वी भाग अभी बिहार में है पुराना शाहाबाद अभी ४ भागों में है भोजपुर, बक्सर, रोहतास, भभुआ।
(५) अंग-मोकामा से पूर्व मन्दारगिरि से पश्चिम, गंगा के दक्षिण, राजमहल के उत्तर। राजधानी चम्पा (मुंगेर के निकट, भागलपुर) । मन्दार पर्वत समुद्र मन्थन अर्थात् झारखण्ड में देव और अफ्रीका के असुरों द्वारा सम्मिलित खनन का केन्द्र था। इसके अधीक्षक वासुकि नाग थे, जिनका स्थन वासुकिनाथ है। कर्ण यहां का राजा था।
(६) पुण्ड्र-मिथिला से पूर्व, वर्तमान सहर्षा और पूर्णिया (कोसी प्रमण्डल) तथा उत्तर बंगाल का सिलीगुड़ी। कोसी (कौशिकी) से दुआर (कूचबिहार) तक। राजधानी महास्थान बोग्रा से १० किमी. उत्तर।
पर्वतीय भाग-(१) मुद्गार्क-राजमहल का पूर्वोत्तर भाग, सन्थाल परगना का पूर्व भाग, भागलपुर और दक्षिण मुंगेर (मुख्यतः अंग के भाग)। मुद्गगिरि = मुंगेर।
(२) अन्तर्गिरि-राजमहल से हजारीबाग तक।
(३) बहिर्गिरि-हजारीबाग से दामोदर घाटी तक।
(४) करूष-विन्ध्य का पूर्वोत्तर भाग, कैमूर पर्वत का उत्तरी भाग, केन (कर्मनाशा) से पश्चिम।
(५) मालवा-मध्य और उत्तरी कर्मनाशा (केन नदी)।
५. विशिष्ट वैदिक शब्द-(१) भोजपुरी-यह प्राचीन काशी राज्य था। काशी अव्यक्त शिव का स्थान था जिसके चतुर्दिक् अग्नि रूप में शिव के ८ रूप प्रकट हुये (८ वसु), इनके स्थान अग्नि-ग्राम (अगियांव) हैं। मूल काशी के चारों तरफ ८ अन्य पुरी थी, कुल ९ पुरियों के लोग नवपुरिया कहलाते थे जो सरयूपारीण (सरयू के पूर्व) ब्राह्मणों का अन्य नाम है। ज्ञान परम्परा के आदिनाथ शिव और यज्ञ भूमि के कारण शिव और यज्ञ से सम्बन्धित शब्द भोजपुरी में अधिक हैं। प्रायः ५० विशिष्ट वैदिक शब्दों में कुछ उदाहरण दिये जाए हैं-
(क) रवा-यज्ञ द्वारा जरूरी चीजों का उत्पादन होता है। जो व्यक्ती उपयोगी काम में सक्षम है उसमें महादेव का यज्ञ वृषभ रव कर रहा है, अतः वह महादेव जैसापूजनीय है। सबसे पहले पुरु ने प्रयाग में यज्ञ-संस्था बनायी थी (विष्णु पुराण, ४/६/३-४)। अतः उनको सम्मान के लिये पुरुरवा कहा गया। अतः प्रयाग से सोन-संगम तक आज भी सम्मान के लिये रवा कहते हैं। जो आदमी किसी काम लायक नहीं है, वह अन-रवा = अनेरिया (बेकार) है।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेषवोऽस्त्विष्टकामधुक्। (गीता ३/१०)
चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति, महोदेवो मर्त्यां आविवेश॥ (ऋक् ४/५८/३)
पुरुरवा बहुधा रोरूयते (यास्क का निरुक्त १०/४६-४७)।
महे यत्त्वा पुरूरवो रणायावर्धयन्दस्यु- हत्याय देवाः। (ऋक् १०/९५/७)
(ख) बाटे (वर्त्तते)-केवल भोजपुरी में वर्त्तते (बाटे) का प्रयोग होता है, बाकी भारत में अस्ति। पश्चिम में अस्ति से ’आहे, है’ हो गया। पूर्व में अस्ति का अछि हो गया। अंग्रेजी में अस्ति से इस्ट (इज) हुआ। इसका कारण है कि जैसे आकाश में हिरण्यगभ से ५ महाभूत और जीवन का विकास हुआ, उसी प्रकार पृथ्वी पर ज्ञान का केन्द्र भारत था और भारत की राजधानी दिवोदास काल में काशी थी। इसका प्रतीक पूजा में कलश होता है जो ५ महाभूत रूप में पूर्ण विश्व है। जीवन आरम्भ रूप में आम के पल्लव हैं तथा हिरण्यगर्भ के प्रतीक रूप में स्वर्ण (या ताम्र) पैसा डालकर इसका मन्त्र पढ़ते हैं-
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ (ऋक् १०/१२१/१, वाजसनेयी यजुर्वेद १३/४, २३/१, अथर्व ४/२/७)
हिरण्य गर्भ क्षेत्र के रूप में काशी है (काश = दीप्ति), परिधि से बाहर निकलने पर प्रकाश। इसकी पूर्व सीमा पर सोन नद का नाम हिरण्यबाहु। यहां समवर्तत हुआ था अतः वर्तते का प्रयोग, भूतों के पति शिव का केन्द्रीय आम्नाय।
(ग) भोजपुरी-किसी स्थान में अन्न आदि के उत्पादन द्वारा पालन करने वाला भोज है। पूरे भारत पर शासन करने वाला सम्राट् है, संचार बाधा दूर करने वाला चक्रवर्त्ती है। उसके ऊपर कई देशों में प्रभुत्व वाला इन्द्र तथा महाद्वीप पर प्रभुत्व वाला महेन्द्र है। विश्व प्रभुत्व वाला विराट् है, ज्ञान का प्रभाव ब्रह्मा, बल का प्रभाव विष्णु। यहां का दिवोदास भोज्य राजा था, अतः यह भोजपुर था। महाभारत में भी यादवों के ५ गणों में एक भोज है, कंस को भी भोजराज कहा गया है। यह सदा से अन्न से सम्पन्न था।
भागवत पुराण, स्कन्ध १०, अध्याय १-श्लाघ्नीय गुणः शूरैर्भवान्भोजयशस्करः॥३७॥
उग्रसेनं च पितरं यदु-भोजान्धकाधिपम्॥६९॥
इमे भोजा अङ्गिरसो विरूपा दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः।
विश्वामित्राय ददतो मघानि सहस्रसावे प्रतिरन्तआयुः॥ (ऋक्३ /५३/७)
नभो जामम्रुर्नन्यर्थमीयुर्नरिष्यन्ति न व्यथन्ते ह भोजाः।
इदं यद्विश्वं भुवनं स्वश्चैतत्सर्वं दक्षिणैभ्योददाति॥ (ऋक् १०/१०७/८)
(इसी भाव में-आरा जिला घर बा कौन बात के डर बा?)
(घ) कठोपनिषद्-अन्न क्षेत्र होने से यहां के ऋषि को वाजश्रवा कहा है (वाज = अन्न, बल, घोड़ा), श्रवा = उत्पादन। वे दान में बूढ़ी गायें दे रहे थे जिसका उनके पुत्र नचिकेता ने विरोध किया। चिकेत = स्पष्ट, जिसे स्पष्ट ज्ञान नहीं है और उसकी खोज में लगा है वह नचिकेता है। या ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में सम्बन्ध जानने वाला। वह ज्ञान के लिये वैवस्वत यम के पास संयमनी पुरी (यमन, अम्मान, मृत सागर, राजधानी सना) गये थे। मनुष्य के २ लक्ष्य हैं प्रेय (तात्कालिक लाभ) और श्रेय (स्थायी लाभ)। भारत में श्रेय आदर्श है अतः सम्मान के लिये श्री कहते हैं। पश्चिम एसिया में प्रेय आदर्श था अतः वहां पूज्य को पीर कहते हैं जो हमारा प्रेय दे सके। नचिकेता पीर से मिलने गया था जो उसे सोना-चान्दी आदि देना चाहते थे, अतः उसके स्थान का नाम पीरो हुआ। वहां की मुद्रा दीनार थी (दीनता दूर करने के लिये), भारत में इस शब्द का प्रयोग मुस्लिम शासन में भी नहीं हुआ है, पर यहां से नचिकेता पीर के पास गया था, अतः यहां का मुख्य बाजार दिनारा कहलाता है। प्रेय को छोड़ कर श्रेय मार्ग लेना धीर के लिये ही सम्भव है, जिसे भोजपुरी में कहते हैं ’संपरता’ जो कठोपनिषद् से आया है-श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतत्, तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः॥ (कठोपनिषद् १/२/२)
(२) मैथिली-इसमें भी प्रायः ५० विशिष्ट वैदिक शब्द हैं जिनमें खोज की जरूरत है। कृषि सूक्त से सम्बन्धित शब्द इसमें हैं-
(क) अहां के-शक्ति रूप में देवनागरी के ५० वर्ण ही मातृका हैं क्योंकि इनसे वाङ्मय रूप विश्व उत्पन्न होता है। मातृ-पूजा में इन्हीं वर्णों का न्यास शरीर के विभिन्न विन्दुओं पर किया जात है। असे ह तक शरीर है, उसे जानने वाला आत्मा क्षेत्रज्ञ है (गीत अध्याय १३), अतः क्ष, त्र, ज्ञ-ये ३ अक्षर बाद में जोड़ते हैं। मातृका रूप शक्ति का स्वरूप होने के कारण मनुष्य को सम्मान के लिये अहं (अहां) कहते हैं अथात् अ से ह तक मातृका।
(ख) सबसे अधिक खेती का विकास मिथिला में हुआ, अतः वहां के शासक को जनक (उत्पादक, पिता) कहते थे। वह स्वयं भी खेती करते थे। वहां केवल खेती थी, वन नहीं था। खेती में सभी वृक्ष घास या दर्भ हैं, अतः इस क्षेत्र को दर्भङ्गा कहते हैं। भूमि से उत्पादित वस्तु सीता है, अतः जनक की पुत्री को भूमि-सुता तथा सीता कहा गया। इसका भाग लेकर इन्द्र (राजा) प्रजा का पालन तथा रक्षण करता है। इसका विस्तृत वर्णन अथर्ववेद के कृषि (३/१७) तथा दर्भ (१९/२८-३०,३२-३३) सूक्तों में है-
अथर्व (३/१७)-इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभिरक्षतु। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरमुत्तरां समाम्॥४॥
शुनं सुफाला वितुदन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अनुयन्तु वाहान्।
शुनासीरा (इन्द्र) हविषा तोशमाना सुपिप्पला ओषधीः कर्तमस्मै॥५॥
सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव। यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भवः॥८॥
घृतेन सीता मधुना समक्ता विश्वैर्देवैरनुमतामरुद्भिः।
सा नः सीता पयसाभ्याववृत्स्वोर्जस्वती घृतवत्पिन्वमाना॥९॥
अथर्व (१९/२८)-घर्म (घाम = धूप) इवाभि तपन्दर्भ द्विषतो नितपन्मणे।
अथर्व (१९/२८)-तीक्ष्णो राजा विषासही रक्षोहा विश्व चर्षणिः॥४॥
= राजा रक्षा तथा चर्षण (चास = खेती) करता है।
(ग) झा-शक्ति के ९ रूपों की दुर्गा रूप में पूजा होती है। नव दुर्गा पूजक को झा कहते हैं क्योंकि झ नवम व्यञ्जन वर्ण है।
(३) मगही के शब्द विष्णु सूक्त में अंगिका के शब्द सूर्य सूक्त में होने चाहिए। इनकी खोज बाकी है।
(४) खनिज सम्बन्धी शब्द स्वभावतः वहीं होंगे जहां खनिज मिलते हैं। बलि ने युद्ध के डर से वामन विष्णु को इन्द्र की त्रिलोकी लौटा दी थी। पर कई असुर सन्तुष्ट नहीं थे और युद्ध चलते रहे। कूर्म अवतार विष्णु ने समझाया कि यदि उत्पादन नहीं हो तो युद्ध से कुछ लूट नहीं सकते अतः देव-असुर दोनों खनिज सम्पत्ति के दोहन के लिये राजी हो गये (१६०० ई.पू.)। असुर भूमि के भीतर खोदने में कुशल थे अतः खान के नीचे वे गये जिसको वासुकि का गर्म मुख कहा गया है। देव लोग विरल धातुओं के निष्कासन में कुशल थे अतः जिम्बाबवे का सोना (जाम्बूनद स्वर्ण) तथा मेक्सिको की चान्दी (माक्षिकः = चान्दी) निकालने के लिये देवता गये। बाद में इसी असुर इलाके के यवनों ने भारत पर आक्रमण कर राजा बाहु को मार दिया (मेगास्थनीज के अनुसार ६७७७ ई.पू.)। प्रायः १५ वर्ष बाद सगर ने आक्रमणकारी बाकस (डायोनिसस) को भगाया और यवनों को ग्रीस जा पड़ा जिसके बाद उसका नाम यूनान हुआ। अतः आज भी खनिज कर्म वाले असुरों की कई उपाधि वही हैं जो ग्रीक भाषा में खनिजों के नाम हैं-
(क) मुण्डा-मुण्ड लौह खनिज (पिण्ड) है और उसका चूर्ण रूप मुर (मुर्रम) है। पश्चिम में नरकासुर की राजधानी लोहे से घिरी थी अतः उसे मुर कहते थे। वाल्मीकि रामायण (किष्किन्धा काण्ड, अध्याय ३९) के अनुसार यहीं पर विष्णु का सुदर्शन चक्र बना था। आज भी यहां के लोगों को मूर ही कहते हैं। लोहे की खान में काम करने वालों को मुण्डा कहते हैं। मुण्ड भाग में अथर्व वेद की शाखा मुण्डक थी जिसे पढ़ने वाले ब्राह्मणों की उपाधि भी मुण्ड है। )
(ख) हंसदा-हंस-पद का अर्थ पारद का चूर्ण या सिन्दूर है। पारद के शोधन में लगे व्यक्ति या खनिज से मिट्टी आदि साफ करने वाले हंसदा हैं।
(ग) खालको-ग्रीक में खालको का अर्थ ताम्बा है। आज भी ताम्बा का मुख्य अयस्क खालको (चालको) पाइराइट कहलाता है।
(घ) ओराम-ग्रीक में औरम का अर्थ सोना है।
(ङ) कर्कटा-ज्यामिति में चित्र बनाने के कम्पास को कर्कट कहते थे। इसका नक्शा (नक्षत्र देख कर बनता है) बनाने में प्रयोग है, अतः नकशा बना कर कहां खनिज मिल सकता है उसका निर्धारण करने वाले को करकटा कहते थे। पूरे झारखण्ड प्रदेश को ही कर्क-खण्ड कहते थे (महाभारत, ३/२५५/७)। कर्क रेखा इसकी उत्तरी सीमा पर है, पाकिस्तान के करांची का नाम भी इसी कारण है।
(च) किस्कू-कौटिल्य के अर्थशास्त्र में यह वजन की एक माप है। भरद्वाज के वैमानिक रहस्य में यह ताप की इकाई है। यह् उसी प्रकार है जैसे आधुनिक विज्ञान में ताप की इकाई मात्रा की इकाई से सम्बन्धित है (१ ग्राम जल ताप १० सेल्सिअस बढ़ाने के लिये आवश्यक ताप कैलोरी है)। लोहा बनाने के लिये धमन भट्टी को भी किस्कू कहते थे, तथा इसमें काम करने वाले भी किस्कू हुए।
(छ) टोप्पो-टोपाज रत्न निकालनेवाले।
(ज) सिंकू-टिन को ग्रीक में स्टैनम तथा उसके भस्म को स्टैनिक कहते हैं।
(झ) मिंज-मीन सदा जल में रहती है। अयस्क धोकर साफ करनेवाले को मीन (मिंज) कहते थे-दोनों का अर्थ मछली है।
(ञ) कण्डूलना-ऊपर दिखाया गया है कि पत्थर से सोना खोदकर निकालने वाले कण्डूलना हैं। उस से धातु निकालने वाले ओराम हैं।
(ट) हेम्ब्रम-संस्कृत में हेम का अर्थ है सोना, विशेषकर उससे बने गहने। हिम के विशेषण रूप में हेम या हैम का अर्थ बर्फ़ भी है। हेमसार तूतिया है। किसी भी सुनहरे रंग की चीज को हेम या हैम कहते हैं। सिन्दूर भी हैम है, इसकी मूल धातु को ग्रीक में हाईग्रेरिअम कहते हैं जो सम्भवतः हेम्ब्रम का मूल है।
(ठ) एक्का या कच्छप-दोनों का अर्थ कछुआ है। वैसे तो पूरे खनिज क्षेत्र का ही आकार कछुए जैसा है, जिसके कारण समुद्र मन्थन का आधार कूर्म कहा गया। पर खान के भीतर गुफा को बचाने के लिये ऊपर आधार दिया जाता है, नहीं तो मिट्टी गिरने से वह बन्द हो जायेगा। खान गुफा की दीवाल तथा छत बनाने वाले एक्का या कच्छप हैं।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Information

This entry was posted on November 16, 2014 by in BIHAR, LOKAS, TIME TRAVEL, VEDAS, YUGAS and tagged , , , .

Blogs I Follow

I'm just starting out; leave me a comment or a like :)

Follow HINDUISM AND SANATAN DHARMA on WordPress.com

Follow me on Twitter

type="text/javascript" data-cfasync="false" /*/* */
%d bloggers like this: