HINDUISM AND SANATAN DHARMA

Cosmos ,Sanatan Dharma.Ancient Hinduism science.

क्या वेद आर्य-द्रविड़ युद्ध का वर्णन करते है?Arya and Dravin- Facts

क्या वेद आर्य-द्रविड़ युद्ध का वर्णन करते है?

वेदों के विषय में एक अन्य भ्रान्ति फैलाई जा रही रही है कि आर्य लोग विदेशी (संभवत मध्य एशिया) थे और वे भारत भूमि पर आक्रमणकारी के रूप में आये। यहाँ के मूल निवासी काले रंग के लोगों पर जो द्रविड़ (दास) थे और जिन्हें आर्यों ने दास और दस्युओं का नाम दिया था पर आर्यों ने अनेक अत्याचार किये[i]। आर्य-द्रविड़ युद्ध की मान्यता के चलते यह भ्रान्ति उत्पन्न होती है कि दक्षिण भारत में रहने वाले एवं श्याम वर्ण वाले जो लोगों पर उत्तर भारत में रहने वाले श्वेत वर्ण वाले लोगों को प्रताड़ित एवं पीड़ित किया हैं। इस भ्रान्ति के निवारण के लिए कुछ प्रश्नों का उत्तर अपेक्षित हैं।

?? आर्य और द्रविड़ शब्द का क्या अर्थ हैं? आर्य कौन कहलाते हैं ? क्या आर्य और द्रविड़ या दास अलग अलग जातियां हैं?

आर्य शब्द कोई जातिवाचक शब्द नहीं है, अपितु गुणवाचक शब्द है। ऋग्वेद[ii] के अनुसार आर्य वे कहलाते हैं जो भूमि पर सत्य, अहिंसा,पवित्रता, परोपकार आदि व्रतों को विशेष रूप से धारण करते हैं। आर्य शब्द ‘ऋ’ धातु से बनता है जिसका अर्थ’गति-प्रापणयो:’ है अर्थात ज्ञान, गमन, प्राप्ति करने और प्राप्त कराने वाले को आर्य कहते हैं। अर्थात आर्य वे हैं जो ज्ञान-संपन्न हैं, जो सन्मार्ग की ओर सदा गति करने वाले पुरुषार्थी हैं और जो ईश्वर तथा परमानन्द को प्राप्त करने तथा तदर्थ-प्रयतनशील होते हैं। संस्कृत कोष[iii] में आर्य का अर्थ पूज्य, श्रेष्ठ, धार्मिक, धर्मशील, मान्य, उदारचरित, शांतचित, न्याय-पथावलम्बी, सतत कर्त्तव्य कर्म अनुष्ठाता आदि मिलता हैं। आर्य शब्द का अर्थ होता हैं “श्रेष्ठ” अथवा बलवान, ईश्वर का पुत्र, ईश्वर के ऐश्वर्य का स्वामी, उत्तम गुणयुक्त, सद्गुण परिपूर्ण आदि।

वेद, रामायण, महाभारत, गीता आदि में “आर्य” शब्द का प्रयोग गुणवाची के रूप में ही हुआ हैं।

आर्य शब्द का प्रयोग वेदों में निम्नलिखित विशेषणों के लिए हुआ हैं।

श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए[iv], इन्द्र का विशेषण[v], सोम का विशेषण[vi],ज्योति का विशेषण[vii], व्रत का विशेषण[viii], प्रजा का विशेषण[ix], वर्ण के विशेषण[x] के रूप में हुआ हैं.

निरुक्त में आर्य शब्द का अर्थ ईश्वर पुत्र: के रूप में हुआ है।

रामायण बालकाण्ड में आर्य शब्द आया है । श्री राम के उत्तम गुणों का वर्णन करते हुए वाल्मीकि रामायण में नारद मुनि ने कहा है – आर्य: सर्वसमश्चायमं, सोमवत् प्रियदर्शन:[xi] अर्थात् श्री राम आर्य – धर्मात्मा, सदाचारी, सबको समान दृष्टि से देखने वाले और चंद्र की तरह प्रिय दर्शन वाले थे।

किष्किन्धा काण्ड[xii] में बालि की स्त्री पति के वध हो जाने पर उसे आर्य पुत्र कह कर रुधन करती है।

महाभारत में “आर्य” शब्द 8 गुणों से युक्त व्यक्ति के लिए हुआ हैं। जो ज्ञानी हो, सदा संतुष्ट रहनेवाला हो, मन को वश में रखनेवाला, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, दानी, दयालु और नम्र गुणवाला आर्य कहलाता हैं।

भगवद्गीता में श्री कृष्ण ने जब देखा कि वीर अर्जुन अपने क्षात्र धर्म के आदर्श से च्युत होकर मोह में फँस रहा है तो उसे सम्बोधन करते हुए उन्होंने कहा – कुतस्त्वा कश्मलमिदं, विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम्, अकीर्ति करमर्जुन[xiii] अर्थात् हे अर्जुन, यह अनार्यो व दुर्जनों द्वारा सेवित, नरक में ले-जाने वाला, अपयश करने वाला पाप इस कठिन समय में तुझे कैसे प्राप्त हो गया ? यहा श्री कृष्ण ने अर्जुन को आर्य बनाने के लिए अनार्यत्व के त्याग को कहा है।

इस प्रकार से वैदिक वांग्मय में आर्य शब्द का प्रयोग गुणों से श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए हुआ हैं।

दास शब्द का अर्थ अनार्य, अज्ञानी, अकर्मा, मानवीय व्यवहार शुन्य, भृत्य, बल रहित शत्रु के लिए हुआ हैं न की किसी विशेष जाति के लोगों के लिए हुआ हैं।

दास शब्द का वेदों में विविध रूपों में प्रयोग –

मेघ के विशेषण में ऋग्वेद[xiv] में हुआ है। शीघ्र बनने वाले मेघ के रूप में ऋग्वेद[xv] में हुआ है। बिना बरसने वाले मेघ के लिए ऋग्वेद[xvi] में हुआ है। बलरहित शत्रु के लिए ऋग्वेद[xvii] में हुआ है। अनार्य के लिए ऋग्वेद[xviii] में हुआ है। अज्ञानी,अकर्मका ,मानवीय व्यवहार से शून्य व्यक्ति के लिए ऋग्वेद[xix] में प्रयोग हुआ है। प्रजा के विशेषण में ऋग्वेद[xx] में प्रयोग हुआ है। वर्ण के विशेषण रूप में ऋग्वेद[xxi] में हुआ है। उत्तम कर्महीन व्यक्ति के लिए ऋग्वेद[xxii] में दास शब्द का प्रयोग हुआ है अर्थात यदि ब्राह्मण भी कर्महीन हो जाय तो वो भी दास कहलायेगा। गूंगे या शब्दहीन के विशेषण में ऋग्वेद[xxiii] में दास का प्रयोग हुआ है।

अष्टाध्यायी[xxiv] में दास का अर्थ लिखा है -दस्यते उपक्षीयते इति दास: जो साधारण प्रयत्न से क्षीण किया जा सके ऐसा साधारण व्यक्ति व 3/1/134 में आया है ” दासति दासते वा य: स:” अर्थात दान करने वाला यहा दास का प्रयोग दान करने वाले के लिए हुआ है। अष्टाध्यायी[xxv] में दास्यति य स दास: अर्थात जो प्रजा को मारे वह दास ” यहा दास प्रजा को और उसके शत्रु दोनों को कहा है। अष्टाध्यायी[xxvi] में हिंसा करने वाले ,गलत भाषण करने वाले को दास दस्यु (डाकू) कहा है।

निरुक्त[xxvii] में कर्मो के नाश करने वाले को दास कहा है।

दस्यु शब्द का अर्थ उत्तम कर्म हीन व्यक्ति[xxviii] ,अज्ञानी,  अव्रती[xxix], मेघ[xxx] आदि के लिए हुआ हैं न की किसी विशेष जाती अथवा स्थान के लोगो के लिए माना गया हैं।

वैदिक वांग्मय में और राष्ट्र के लिए सहायक व्यक्तियों को आर्य एवं घातक व्यक्तियों को दास या दस्युओं माना गया हैं। आर्य और द्रविड़ में भेद व्यक्ति के गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर बताये गए हैं। न की उत्तर दक्षिण भारतीय, श्याम-श्वेत वर्ण,बाहर से आये हुए एवं स्थानीय मूलनिवासी के आधार पर माना गया हैं। इस विषय को ठीक प्रकार से न समझ पाने के कारण पश्चिमी लेखकों ने आर्यों द्वारा भारत पर बाहर से आकर आक्रमण करने की निराधार कल्पना को जन्म दिया। इसी अधकचरे ज्ञान के आधार पर  कुछ लोग अपनी छोटी राजनीती करते दीखते हैं। यह समाधान पढ़ लेने के पश्चात आर्य-द्रविड़ युद्ध की कल्पना त्यागने योग्य हैं।

? वेदों के मन्त्रों के आधार पर ऐसा प्रतीत होता हैं की आर्य और भारत के आदिवासी दो अलग अलग जातियां थी। आर्य और आदिवासीओ का स्वरुप और धार्मिक विश्वास भिन्न भिन्न था।

पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों के अनुसार आदिवासीओ को काले वर्ण वाला, अनास यानि चपटी नाक वाला और लिंग देव अर्थात शीशनदेव की पूजा करने वाला लिखा हैं जबकि आर्यों को श्वेत वर्ण वाला सीधी नाक वाला और देवताओं की पूजा करने वाला लिखा हैं।

MacDonnell लिखते है the term Das, Dasyu properly the name of the dark aborigine’s अर्थात दास, दस्यु काले रंग के आदिवासी ही हैं।

Griffith Rigveda 1/10/1 – The dark aborigines who opposed the Aryans अर्थात काले वर्ण के आदिवासी जो आर्यों का विरोध करते थे।

Vedic mythology[xxxi] में भी आर्यों द्वारा कृष्ण वर्ण वाले दस्युओ को हरा कर उनकी भूमि पर अधिकार करने की बात कही गयी हैं। ऋग्वेद के 1/101/1, 1/130/8, 2/20/7 और 4/16/13 मंत्रो का हवाला देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया हैं की भारत के मूल निवासी कृष्ण वर्ण के थे। ऋग्वेद 7/17/14 में सायण ने कृष्ण का अर्थ मेघ की काली घटा किया है।

अन्य सभी मंत्रो में इसी प्रकार इन्द्र के वज्र का मेघ रुपी बादलों से संघर्ष का वर्णन है। बादलों के कृष्ण वर्ण की आदिवासियो के कृष्ण वर्ण से तुलना कर बिजली (इन्द्र के वज्र) और बादल (मेघ) के संघर्ष के मूल अर्थ को छुपाकर उसे आर्य-दस्यु युद्ध की कल्पना करना कुटिलता नहीं तो और क्या हैं। वैदिक इंडेक्स के लेखक ने ऋग्वेद 5/29/10 में अनास शब्द की चपटी नाक वाले द्रविड़ आदिवासी की व्याख्या की है। ऋग्वेद[xxxii] में दासो को द्वेषपूर्ण वाणी वाले या लड़ाई के बोल बोलने वाले कहाँ गया है।

ऋग्वेद[xxxiii] में अनास शब्द का अर्थ चपटी नाक वाला नहीं अपितु शब्द न करने वाला अर्थात मूक मेघ हैं जिसे इन्द्र अपने वज्र (बिजली) से छिन्न भिन्न कर देता हैं। यहाँ भी अपनी कुटिलता से द्रविड़ आदिवासियो को आर्यों से अलग दिखने का कुटिल प्रयास किया गया है।

वैदिक इंडेक्स के लेखक ने ऋग्वेद 7/21/5 और 10/99/3 के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया हैं की दस्यु लोगो की पूजा पद्यति विभिन्न थी और वे शिश्नपूजा अर्थात लिंग पूजा करते थे।

यास्काचार्य ने निरुक्त[xxxiv]  में शिश्न पूजा का अर्थ किया हैं अब्रहमचर्य अर्थात जो कामी व्यभिचारी व्यक्ति हो किया हैं। ऋग्वेद के 7/21/5 और 10/99/3 में भी कहा गया हैं की लोगों को पीड़ा पहुचने वाले, कुटिल, तथा शिश्नदेव (व्यभिचारी) व्यक्ति हमारे यज्ञो को प्राप्त न हो अर्थात दुस्त व्यक्तियों का हमारे धार्मिक कार्यो में प्रवेश न हो।

वैदिक इंडेक्स के लेखक इन मंत्रो के गलत अर्थ को करके भ्रान्ति उत्पन्न कर रहे हैं की दस्यु लोग लिंग पूजा करते हैं एवं आर्य लोग उनसे विभिन्न पूजा पद्यति को मानने वाले हैं। सत्य अर्थ यह हैं की दस्यु शब्द किसी वर्ग या जाति विशेष का नाम नहीं हैं बल्कि जो भी व्यक्ति दुर्गुण युक्त हैं। वह दस्यु है और दुर्गुणी व्यक्ति किसी भी समुदाय में हो दूर करने योग्य है। वेद मन्त्रों के गलत अर्थ दिखाकर को भिन्न भिन्न जातियों के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया गया है। जिससे परस्पर अंतर्विरोध एवं द्वेष भावना को बल मिले।

?  आर्य-दस्यु युद्ध पर स्वामी दयानंद के क्या दृष्टिकोण है?

स्वामी दयानंद आर्यों के बाहर से आने एवं स्थानियों को युद्ध में परास्त करने का स्पष्ट खंडन करते है। स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं-

“किसी संस्कृत ग्रन्थ में वा इतिहास में नहीं लिखा की आर्य लोग इरान से आये और यहाँ के जंगलियो को लरकर जय पा के निकाल के इस देश के राजा हुए[xxxv]।”

स्वामी जी आर्यों और दस्युओं का गुणों के आधार पर विभाजन मानते हैं। “जो आर्य श्रेष्ठ और दस्यु दुष्ट मनुष्यों को

कहते हैं वैसे ही मैं भी मानता हूँ”

स्वामी जी आर्यों के निवास स्थान को आर्यव्रत के रूप में सम्बोधित करते हुए उसे भारतवर्ष ही मानते है। स्वामी जी

लिखते है-

“आर्याव्रत देश इस भूमि का नाम इसलिए हैं की इसमें आदि सृष्टि से आर्य लोग निवास करते हैं परन्तु इसकी अवधि उत्तर में हिमालय दक्षिण में विन्ध्याचल पश्चिम में अटक और पूर्व में ब्रहमपुत्र नदी है, इन चारों के बीच में जितना प्रदेश हैं उसको आर्याव्रत कहते और जो इसमें सदा रहते हैं उनको भी आर्य कहते हैं[xxxvi]।”

आर्य और दस्यु के मध्य संबंधों पर स्वामी दयानंद द्वारा विशेष व्याख्या करी गई है। स्वामी जी ऋग्वेद 10/64/11 मंत्र की व्याख्या करते हुए लिखते है-

हे यथायोग्य सबको जाननेवाले ईश्वर! आप ‘आर्यान्’ विद्या-धर्म आदि उत्कृष्ट स्वभाव आचरण युक्त आर्यों को जानो ‘ये च दस्यव:’ और जो नास्तिक, डाकू, चोर, विश्वासघाती, मुर्ख, विषय-लम्पट, हिंसा आदि दोषयुक्त, उत्तम कर्मों में विघ्न करनेवाले,स्वार्थी, स्वार्थ-साधन में तत्पर, वेद-विद्या-विरोधी अनार्य मनुष्य ‘बहिर्ष्मते’ सर्वोपकारक यज्ञ के विध्वंशक हैं। इन सब दुष्टों को आप (रन्धय) समुलान् विनाशय- मूलसहित नष्ट कर दीजिये। और (शासद व्रतान्) ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास आदि धर्मानुष्ठान व्रतरहित, वेदमार्ग उच्छेदक अनाचारियों को यथायोग्य शासन कीजिये (शीघ्र उन पर दंड- निपातन करो)जिससे वे भी शिक्षायुक्त हो के शिष्ट हों अथवा उनका प्राणान्त हो जाय,किं वा हमारे वश में ही रहे (शाकी) तथा जीव को परम शक्तियुक्त,शक्ति देने और उत्तम कामों में प्रेरणा करनेवाले हों। आप हमारे दुष्ट कामों के विरोधक हो। मैं उत्कृष्ट स्थानों में निवास करता हुआ तुम्हारी अज्ञानुकूल सब उत्तम कर्मों की कामना करता हूंसो आप पूरी करें[xxxvii]

स्वामी दयानंद भी आर्य-दस्यु शब्दों को गुणात्मक मानते हैं न की किसी विशेष समूह अथवा जाति के आधार पर मानते हैं।

योगी अरविन्द भी स्वामी दयानंद के समान आर्य शब्द को गुणात्मक मानते है। अरविन्द जी के अनुसार आर्य शब्द में उदारता,नम्रता, श्रेष्ठता, सरलता, साहस, पवित्रता, दया, निर्बल संरक्षण, ज्ञान के लिए उत्सुकता, सामाजिक कर्तव्य पालनादि सब उत्तम गुणों का समावेश हो जाता है। मानवीय भाषा में इससे अधिक उत्तम और कोई शब्द नहीं। आर्य आत्मसंयमी और आंतरिक तथा बाह्य स्वराज्य -प्रेमी होता है। वह अज्ञान, बंधन तथा किसी प्रकार की दासता में रहना पसंद नहीं करता। उसकी इच्छा शक्ति दृढ़ होती है। प्रत्येक वस्तु में वह सत्य, उच्चता तथा स्वतंत्रता की खोज करता है। आर्य एक कार्यकर्ता और योद्धा होता है जो अपने अंदर और जगत में ईश्वर के राज्य को लाने के लिए अज्ञान, अन्याय तथा अत्याचारादि के विरुद्ध युद्ध करता है[xxxviii]

? क्या वेदों में आर्य-द्रविड़ युद्ध का वर्णन मिलता है?

वैदिक इंडेक्स आदि के लेखको ने यह भी सिद्ध करने का प्रयास किया हैं की वेद में आर्य और दस्युओ के युद्ध का वर्णन हैं। वेद में दासों के साथ युद्ध करने का वर्णन तो मिलता है पर यह मानवीय नहीं अपितु प्राकृतिक युद्ध हैं। जैसे इन्द्र और वृत्र का युद्ध।  इन्द्र बिजली का नाम हैं जबकि वृत्र मेघ का नाम है।  इन दोनों का परस्पर संघर्ष प्राकृतिक युद्ध के जैसा हैं। यास्काचार्य ने भी निरुक्त 2/16  में इन्द्र-वृत्र युद्ध को प्राकृतिक माना है। इसलिए वेद में जिन भी स्थलों पर आर्य-दस्यु युद्ध की कल्पना की गई है उन स्थलों को प्रकृति में होने वाली क्रियाओ को उपमा अलंकार से दर्शित किया गया हैं। उनके वास्तविक अर्थ को न समझ कर अज्ञानता से अथवा जान कर वेदों को बदनाम करने के लिए एवं आर्य द्रविड़ के विभाजन की निति को पोषित करने के लिए युद्ध की परिकल्पना कई गयी हैं जो की गलत हैं।

?डॉ अम्बेडकर के आर्यों के बाहर से आकर यहाँ पर बसने सम्बंधित विषय पर क्या विचार थे? 

डॉ अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक शूद्र कौन?[xxxix]  में स्पष्ट रूप से विदेशी लेखकों की आर्यों के बाहर से आकर यहाँ पर बसने सम्बंधित मान्यता का स्पष्ट खंडन किया हैं। डॉ अम्बेडकर लिखते है-

  1. वेदों में आर्य जाति के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है।
  1. वेद में ऐसा कोई प्रसंग उल्लेख नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि आर्यों ने भारत पर आक्रमण कर यहाँ के मूलनिवासी दासो-दस्युओं को विजय किया।
  1. आर्य, दास और दस्यु जातियों के अलगाव को सिद्ध करने के लिये कोई साक्ष्य वेदों में उपलब्ध नहीं है।
  1. वेदों में इस मत की पुष्टि नहीं की की गई की गयी कि आर्य, दासों और दस्युओं से भिन्न रंग थे।

डॉ अम्बेडकर ने स्पष्ट रूप से स्वामी दयानंद की मान्यता का अनुमोदन किया है।  वे न तो आर्य शब्द को जातिसूचक मानते थे अपितु गुणवाचक ही मानते थे।  इसी सन्दर्भ में उन्होंने शूद्र शब्द को इसी पुस्तक के पृष्ठ 80 पर “आर्य” ही माना है। वे किसी भी आर्यों के बाहरी आक्रमण का स्पष्ट खंडन करते हैं। न ही आर्य और दास को अलग मानते हैं। रंग, बनावट आदि के आधार पर आर्यों-दस्युओं में भेद को स्पष्ट ख़ारिज करते हैं।
[i] The Aryan invaders or immigrants found in India to groups of people, one of which they named the Dasas and Dasyu, and the other Nishadas. Vedic Age p.156 अर्थात आर्य आक्रान्ताओं ने भारत में दो प्रकार के वर्गों को पाया। एक वर्ग को उन्होंने दास और दस्यु का नाम दिया और दूसरे को निषादों का।

[ii] ऋग्वेद 10/64/11

[iii] शब्दकल्पद्रुम

[iv] ऋग्वेद 1/103/3, ऋग्वेद 1/130/8, ऋग्वेद 10/49/3

[v][v] ऋग्वेद 5/34/6, ऋग्वेद 10/138/3

[vi] ऋग्वेद 9/63/5

[vii] ऋग्वेद 10/43/4

[viii] ऋग्वेद 10/65/11

[ix] ऋग्वेद 7/33/7

[x] ऋग्वेद 3/34/9

[xi] रामायण बालकाण्ड 1/16

[xii] किष्किन्धा काण्ड 19/27

[xiii] गीता 2/3

[xiv] ऋग्वेद 5/30/7

[xv] ऋग्वेद 6/26/5

[xvi] ऋग्वेद 7/19/2

[xvii] ऋग्वेद 10/83/1

[xviii] ऋग्वेद 10/83/19

[xix] ऋग्वेद 10/22/8

[xx] ऋग्वेद 6/25/2,10/148/2और 2/11/4

[xxi] ऋग्वेद 3/34/9,2/12/4

[xxii] ऋग्वेद 10/22/8

[xxiii] ऋग्वेद 5/29/10

[xxiv] अष्टाध्यायी 3/3/19

[xxv] अष्टाध्यायी 3/1/134

[xxvi]अष्टाध्यायी 5/10

[xxvii] निरुक्त 7/23

[xxviii] ऋग्वेद 7/5/6

[xxix] ऋग्वेद 10/22/8

[xxx] ऋग्वेद 1/59/6

[xxxi] p 151,152

[xxxii] ऋग्वेद 5/29/10

[xxxiii] ऋग्वेद 5/129/10

[xxxiv] निरुक्त 4/19

[xxxv] सत्यार्थ प्रकाश,8 सम्मुलास– स्वामी दयानंद

[xxxvi] सव-मंतव्य-अमंतव्य-प्रकाश-स्वामी दयानंद

[xxxvii] आर्याभिविनय 1/14

From vedic wisdom

link डॉ विवेक आर्य

One comment on “क्या वेद आर्य-द्रविड़ युद्ध का वर्णन करते है?Arya and Dravin- Facts

  1. Sanatan Dharm and Hinduism
    December 11, 2015

    Reblogged this on SANSKRIT.

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Follow me on Twitter

%d bloggers like this: