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Maihar Ki Devi-A short fact

आल्हा को दिया था शारदा मां ने अमर होने का वरदान


बैरागढ़/उरई (जालौन)। जिले में पौराणिक स्थलों का अलग महत्व है। कभी दिल्ली, कन्नौज और महोबा की रियासतों के केंद्र रहे एट थाना क्षेत्र का बैरागढ़ अकोढ़ी में दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान और महोबा के आल्हा, ऊदल की आखिरी लड़ाई हुई थी। मान्यता है कि आल्हा को मां शारदा का आशीर्वाद प्राप्त था। लिहाजा पृथ्वीराज चौहान की सेना को पीछे हटना पड़ा। मां के आदेशानुसार आल्हा ने अपनी साग (हथियार) यहीं मंदिर पर चढ़ाकर नोक टेढ़ी कर दी थी। जिसे आज तक कोई साधा नहीं कर पाया है। मंदिर परिसर में ही तमाम ऐतिहासिक महत्व के अवशेष अभी भी आल्हा व पृथ्वीराज चौहान की जंग की गवाही देते हैं।

एट से आठ किलोमीटर दूर मां शारदा में श्रद्धालुओं का तांता लगा था। साधक तंत्र साधना में लीन थे। पुजारी शारदा शरण ने मंदिर बताया कि उनके पूर्वज 1433 ईसवी से मंदिर की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। मां शारदा शक्ति पीठ का उल्लेख दुर्गा सप्तसती में भी है।
आचार्य श्याम जी दुबे ने बताया कि मान्यता है कि पृथ्वी की मध्य धुरी बैरागढ़ में है। मां की मूर्ति की किसी ने स्थापना नहीं की है। यह जमीन अपने आप ही उदय हुई है। जब महोबा के राजा परमाल के ऊपर पृथ्वीराज चौहान की सेना ने हमला किया तो उनके वीर योद्धा आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान से युद्ध के लिए बैरागढ़ में ही डेरा डाल रखा था। यहीं वह पूजा अर्चना करने आए तो मां ने साक्षात दर्शन देकर उन्हें युद्ध के लिए सांग दी। काफी खून खराबे के बाद पृथ्वीराज चौहान की सेना को पीछे हटना पड़ा। युद्ध से खिन्न होकर आल्हा ने मंदिर पर सांग चढ़ाकर उसकी नोक टेढ़ी कर वैराग्य धारण कर लिया। मान्यता है कि मां ने आल्हा को अमर होने का वरदान दिया था। लोगों की माने तो आज भी कपाट बंद होने के बावजूद कोई मूर्ति की पूजा कर जाता है। बहरहाल आस्था व शक्ति की प्रतीक मां शारदा के हर नवरात्रि पर लाखों लोग दर्शन कर मन्नतें मांगते हैं।
इनसेट
मंदिर में बने कुंड में स्नान करने से मिट जाते हैं चर्म रोग
बैरागढ़/उरई (जालौन)। मां शारदा शक्ति पीठ के ठीक पीछे बने कुंड के बारे में मान्यता है कि इसमें एक बार स्नान करने से चर्म रोग ठीक हो जाते हैं। यह कुंड कभी खाली नहीं हुआ है और न ही कोई उसे खाली कर पाया है। मंदिर के पुजारी आचार्य श्यामजी दुबे ने बताया कि इस कुंड में अब तक न जाने कितने चर्मरोगी स्वास्थ्य लाभ ले चुके हैं। कई बार पंप से कुंड को खाली करवाने का प्रयास किया गया है लेकिन कभी भी कुंड खाली नहीं हुआ। आज तक कोई भी कुंड की गहराई नहीं नाप सका है।
इनसेट
पृथ्वीराज से भी वीर थे आल्हा ऊदल
उरई (जालौन)। पृथ्वीराज चौहान और आल्हा ऊदल के बीच 52 बार युद्ध हुआ और हर बार पृथ्वीराज की सेना को भारी क्षति हुई। बुंदेली इतिहास में आल्हा ऊदल का नाम बड़े ही आदर भाव से लिया जाता है। बुंदेली कवियों ने आल्हा का गीत भी बनाया है। जो सावन के महीने में बुंदेलखंड के हर गांव गली में गाया जाता है। जैसे पानी दार यहां का पानी आग, यहां के पानी में शौर्य गाथ के रूप से गाया जाता है। यही नहीं बड़े लड़ैया महोबे वाले खनक-खनक बाजी तलवार आज भी हर बुंदेलों की जुबान पर है। राजा परमाल की बेटी बेला का पृथ्वीराज की सेना ने अपहरण करने की धमकी दी थी। जिस पर कीरत सागर के मैदान में महोबा व दिल्ली की सेना के बीच युद्ध हुआ। इसमें पृथ्वीराज चौहान की पराजय हुई और आल्हा ऊदल की सुरक्षा में बेला ने सावन के बाद पड़ने वाले त्योहार भुजरियां सागर में विसर्जित की।

देलखंड की वीर भूमि महोबा और आल्हा एक दूसरे के पर्याय हैं। महोबा की सुबह आल्हा से शुरू होती है और उन्हीं से खत्म। बुंदेलखंड का जन-जन आज भी चटकारे लेकर गाता है-

बुंदेलखंड की सुनो कहानी बुंदेलों की बानी में
पानीदार यहां का घोडा, आग यहां के पानी में

महोबा के ढेर सारे स्मारक आज भी इन वीरों की याद दिलाते हैं। सामाजिक संस्कार आल्हा की पंक्तियों के बिना पूर्ण नहीं होता। आल्ह खंड से प्रभावित होता है। जाके बैरी सम्मुख ठाडे, ताके जीवन को धिक्कार । आल्हा का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि 800 वर्षो के बीत जाने के बावजूद वह आज भी बुंदेलखंड के प्राण स्वरूप हैं। आल्हा
आल्हा गायक इन्हंे धर्मराज का अवतार बताता है। कहते है कि इनको युद्ध से घृणा थी और न्यायपूर्ण ढंग से रहना विशेष पसंद था । इनके पिता जच्छराज (जासर) और माता देवला थी। ऊदल इनका छोटा भाई था। जच्छराज और बच्छराज दो सगे भाई थे जो राजा परमा के यहाॅ रहते थे। परमाल की पत्नी मल्हना थी और उसकी की बहने देवला और तिलका से महाराज ने अच्छराज और बच्छराज की शादी करा दी थी। मइहर की देवी से आल्हा को अमरता का वरदानल मिला था। युद्ध में मारे गये वीरों को जिला देने की इनमें विशेशता थी। लाार हो कर कभी-कभी इन्हें युद्ध में भी जाना पड़ता था। जिस हाथी पर ये सवारी करते थे उसका नाम पष्यावत था। इन का विवाह नैनागढ़ की अपूर्व सुन्दरी राज कन्या सोना से हुआ था। इसी सोना के संसर्ग से ईन्दल पैदा हुआ जो बड़ा पराक्रमी निकला। शायद आल्हा को यह नही मालूम था कि वह अमर है। इसी से अपने छोटे एवं प्रतापी भाई ऊदल के मारे जाने पर आह भर के कहा है-
पहिले जानिति हम अम्मर हई,
काहे जुझत लहुरवा भाइ ।
(कहीं मैं पहले ही जानता कि मैं अमर हूँ तो मेरा छोटा भाई क्यों जूझता)

यह आल्हा का छोटा भाई, युद्ध का प्रेमी और बहुत ही पतापी था। अधिकांष युद्धों का जन्मदाता यही बतलाया जाता है। इसके घेड़े का नमा बेंदुल था। बेंदुल देवराज इन्द्र के रथ का प्रधान घोड़ा था। इसक अतिरिक्त चार घोड़े और इन्द्र के रथ मंे जोते जाते थे जिन्हंे ऊदल धरा पर उतार लाया था। इसकी भी एक रोचक कहानी है। – ‘‘कहा जाता है कि देवराज हन्द्र मल्हना से प्यार करता था। इन्द्रसान से वह अपने रथ द्वारा नित्ःय र्ही आ निषा में आता था। ऊदल ने एक रात उसे देख लिया और जब वज रथ लेकर उ़ने को जुआ, ऊदल रथ का धुरा पकड़ कर उड़ गया। वहां पहुंच कर इन्द्र जब रथ से उतरा, ऊदल सामने खड़ा हो गया। अपनल मार्यादा बचाने के लिए इन्द्र ने ऊदल के ही कथ्नानुसार अपने पांचों घोडे़ जो उसके रथ में जुते थे दे दिये। पृथ्वी पर उतर कर जब घोड़ों सहित गंगा नदी पार करने लगा तो पैर में चोट लग जाने के कारण एक घोड़ा बह गया। उसका नाम संडला था और वह नैनागढ़ जिसे चुनार कहते है किले से जा लगा। वहां के राजा इन्दमणि ने उसे रख लिया। बाद में वह पुनः महोबे को लाया गया और आल्हा का बेटा ईन्दल उस पर सवारी करने लगा।
ऊदल वीरता के साथ-साथ देखने में भी बड़ा सुनछर था। नरवरगढ़ की राज कन्या फुलवा कुछ पुराने संबंध के कारण सेनवा की षादी मं्रंे नैनागढ़ गयी थी। द्वार पूजा के समय उसने ऊदल को दख तो रीझ गयी। अन्त में कई बार युद्ध करने पर ऊदल को उसे अपनल बनाना पड़रा। ऊदल मं धैर्य कम था। वह किसी भी कार्य को पूर्ण करने के हतु शीघ्र ही शपथ ले लेता था। फिर भी अन्य वीरों की सतर्कता से उसकी कोई भी प्रतिज्ञा विफल नही हुई। युद्ध मंे ही इसका जीवन समाप्त हो गया। इसका मुख्य अस्त्र तलवार था।

ALHA KHAND

3 comments on “Maihar Ki Devi-A short fact

  1. Reblogged this on GLOBAL HINDUISM.

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  2. Pingback: Maihar Ki Devi-A short fact – Voice of world

  3. Bijender Tanwar
    March 25, 2018

    Hindu and specially Rajput always live in dreams and limited by their own streets. those day Muslim already started coming to Mahoba but Hindu king never understand. if they have so much power then why not fight with Muslims in Sindh and Afghanistan. We Hindu have no wisdom and no religious infrastructure. In 15 years again Muslim will rule and ab ki baar clean all Hindus. so stupid

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This entry was posted on March 24, 2018 by in HINDUISM SCIENCE, maihar devi and tagged , , , , .

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